पुलिस ने अफसरों के फर्जी हस्ताक्षर करके सरकारी योजनाओं का धन हड़पने वाले गैंग का पर्दाफाश कर दिया है। पुलिस ने बुधवार को रोडवेज से गैंग के दो सदस्यों को गिरफ्तार किया है। गैंग के तार कई जनपदों से जुड़े हुए हैं।
मामला यूपी के बिजनौर का है। जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी बिजनौर डा. अमृता सिंह ने सरकारी योजनाओं की 22 लाख रुपये की धनराशि हड़पने का आरोप लगाते हुए अज्ञात ठगों के खिलाफ 15 जून को शहर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।
आरोप था कि ठगों ने अल्पसंख्यक छात्रों की छात्रवृति फर्जी तरीके से हड़प ली है। घटना के खुलासे के लिए एसपी सुनील कुमार सक्सैना ने एसपी सिटी संजय सिंह, प्रभारी निरीक्षक शहर कोतवाली राकेश पालीवाल व क्राइम ब्रांच को निर्देश दिए थे।
कई जनपदों से जुड़े हैं गैंग के तार
पुलिस टीम ने बुधवार को रोडवेज बस स्टैंड के पास से मनोज कुमार पुत्र सत्यपाल सिंह निवासी दीनदयाल नगर थाना सिविल लाईन मुरादाबाद और कमल सिंह पुत्र महकार सिंह निवासी गांव अखत्यारपुर भूड़ थाना धनौरा जनपद अमरोह को गिरफ्तार किया है।
पुलिस के मुताबिक ये दोनों आरोपी सरकारी योजनाओं की धनराशि हड़पने वाले गैंग के सदस्य हैं।
पुलिस के मुताबिक पकड़े गए युवकों ने पूछताछ में बताया है कि अल्पसंख्यक छात्रों की छात्रवृति के लिए जाने वाले ड्राफ्ट को वे फर्जी तरीके से प्राप्त करते थे और फर्जी नाम पते से बैंकों में खाते खुलवाते थे।
कई सवाल अभी भी बने हुए हैं पहेली
इसके बाद उसकी रकम प्राप्त कर लेते थे। आरोपियों ने अल्पसंख्यक छात्रों के लिए आई 22 लाख रुपये से ज्यादा की धनराशि के ड्राफ्ट बैंकों से कैश कराना स्वीकार किया है।
छात्र-छात्राओं के बैंक एकाउंट गलत होने के कारण छात्रवृति की रकम उनके खातों में ट्रांसफर नहीं हो पाती है। इस रकम को बैंक द्वारा संबंधित विभाग को ड्राफ्ट के माध्यम से वापस भेजने का प्रावधान है।
ड्राफ्ट के बारे में या तो बैंक को पता होता है या फिर संबंधित विभाग को। गैंग तक ड्राफ्ट की सूचना कैसे पहुंचती थी? बैंक फर्जी एकाउंट में ड्राफ्ट को कैसे ट्रांसफर कर देते थे? क्या बैंक अधिकारी गैंग से मिले हुए हैं? कैसे खुले फर्जी खाते?