दिल्ली में बिटिया को श्रद्धांजलि देने का दौर शुरू हो गया है, लेकिन उसके घर में सन्नाटा पसरा है। मां अपनी दुलारी को याद करते हुए बस आंसू बहाती है।
सिसकते हुए वह बस इतना ही कह पाती हैं, ‘दुनियाभर में मेरी बच्ची को 16 दिसंबर को श्रद्धांजलि दी जाएगी, पर हम तो वो भी नहीं कर सकते। एक साल हो रहा है और दरिंदे जिंदा हैं। हर पल यह दर्द सताता है कि बिटिया को इंसाफ नहीं दिला सके।’
बिटिया का परिवार राजधानी की एक सोसायटी में पुराने घर से शिफ्ट हो चुका है। हालांकि, सोमवार को परिवार पुराने घर जाएगा। मां कहती हैं, ‘हमें विश्वास है कि बिटिया कल हमसे मिलेगी। उस घर से उसकी बचपन की यादें हैं।’
'खुशियां छीन ली'
पिता और दोनों भाई भी खामोशी से बैठे हुए थे। भाई ने कहा, ‘पहली बार राखी के दिन हमारी कलाई खाली थी। दीदी होती तो शायद जिंदगी कुछ अलग होती। बेशक सरकार ने घर और पैसा दे दिया है, लेकिन बदले में खुशियां छीन ली हैं। दीदी के आगे हर चीज बेमानी है।’
'आलू के परांठे पसंद थे उसे'
वहीं, बिटिया की मां का कहना है, ‘जीना है तो खाना तो पड़ेगा। यूं तो उसे खाने में सब कुछ पसंद था, लेकिन 16 दिसंबर को खास आलू के परांठे बनाऊंगी, ताकि वो जहां भी हो, उसका पेट भर सके। उसे भूखा रहना पसंद नहीं था। श्रद्धांजलि तो नहीं पर उसके लिए खास आलू के परांठे बनाकर रखने हैं।’
किसी ने नहीं ली परिवार की सुध
घटना के बाद दिल्ली, यूपी व केंद्र सरकार समेत महिला आयोग ने बिटिया के परिवार को अपनाने की बात की थी, लेकिन आठ माह में सरकार के किसी नुमाइंदे ने खोज खबर नहीं ली है। राजधानी में श्रद्धांजलि का दौर चल रहा है, लेकिन किसी ने परिवार की सुध नहीं ली। भाई छोटे हैं, इसलिए पिता को नौकरी देने की घोषणा हुई थी। वो भी महज वादों में ही छूट गई।
परिवार का कहना है, 'बिटिया को पूरा इंसाफ दिलाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। देखो पूरा इंसाफ मिलता है या फिर अधूरा। एक ही सपना है पांचों दोषी फांसी के तख्ते पर झूलें, ताकि देश की अन्य बेटियां सुरक्षित हो सकें।’