दिल्ली गैंगरेप मामले में आरोपियों ने अपने बचाव के लिए जो झूठे साक्ष्य पेश किए, वे उनको फांसी के फंदे के करीब ही ले गए।
आरोपियों ने स्वयं के बचाव के लिए हर प्रकार का हथकंडा अपनाया लेकिन वे अपने ही बुने जाल में फंस गए और उनके पेश साक्ष्य ही उनका अपराध साबित करने में सहायक बने।
तस्वीरों में देखिए:- दिल्ली गैंगरेप के दरिंदों को फांसी की मांग
आरोपी विनय व पवन ने सुनवाई के दौरान तर्क दिया था कि 16 दिसंबर की रात वे घटना के समय चलती बस में नहीं थे बल्कि दक्षिणी दिल्ली के डिस्ट्रिक्ट पार्क में आयोजित एक म्यूजिक कार्यक्रम में उपस्थित थे।
इतना ही नहीं विनय ने तो उक्त प्रोग्राम में हिस्सा भी लिया था। उन्होंने अपने मोबाइल फोन में उक्त कार्यक्रम की क्लिपिंग होने का भी तर्क रखा।
अदालत में अभियोजन पक्ष ने उनके तर्कों की काट के लिए अपने गवाह पेश किए, जिनमें उद्यान विभाग के अधिकारी, वहां स्थित चर्च के पादरी आदि के बयानों से स्पष्ट हो गया कि उस रात पार्क में कोई कार्यक्रम नहीं था। इसके अलावा ऐसे कार्यक्रम वहां आयोजित ही नहीं होते।
इन गवाहों के बयानों से स्पष्ट हो गया कि दोनों ही आरोपी झूठ बोल रहे थे।
इसी प्रकार अक्षय ने तर्क रखा कि घटना वाली रात से एक दिन पहले ही वह अपने गांव जाने के लिए स्टेशन पर था और रात की ट्रेन पकड़ कर गांव पंहुच गया था। उसने गांव के कई लोगों को बतौर गवाह पेश किया लेकिन साबित नहीं कर पाया कि वह घटना में शामिल नहीं था।
खुली पोल
इन तीनों के उम्मीदों पर उन्हीं के साथी मुकेश ने पानी फेर दिया। बड़े भाई राम सिंह के जेल में आत्महत्या करने के कारण डर व कम सजा पाने की कड़ी में उसने सभी की पोल खोल दी।
मुकेश ने अपने बयानों में मान लिया कि घटना के समय उसके भाई सहित सभी आरोपी बस में ही मौजूद थे और घटना को अंजाम दिया।
अदालत ने भी आरोपियों के झूठे साक्ष्य को खारिज करते हुए कहा उनके द्वारा पेश झूठे साक्ष्य ही उनके खिलाफ साक्ष्य के रूप में सामने आए हैं। अदालत ने कहा आरोपियों के झूठ से स्पष्ट हो गया कि वे घटना में शामिल थे और मात्र बचाव के लिए झूठ बोल रहे हैं। इसके अलावा मुकेश के बयान से भी स्पष्ट है सभी घटना में शामिल थे। यानी आरोपी अपने बुने हुए जाल में स्वयं ही फंस गए।