प्रदेश में नगर निगम के अस्पतालों की हालत किसी से छिपी नहीं है। हंसा रिसर्च के सर्वे में शामिल शहरों के सिर्फ चार फीसदी लोगों ने माना है कि वह नगर निगम के अस्पतालों में इलाज कराते हैं।
10 लाख की आबादी से अधिक और कम, दोनों ही किस्म के शहरों में नगर निगम के अस्पतालों में इलाज कराने वालों की संख्या काफी कम है। अलबत्ता गोरखपुर में सर्वाधिक 16 फीसदी ने बताया कि वे बीमार पड़ने पर नगर निगम के अस्पताल का रुख करते हैं।
इसके बाद अलीगढ़ ऐसा शहर है, जहां नौ फीसदी लोगों का नगर निगम के अस्पताल पर भरोसा है। बड़े शहरों में शामिल वाराणसी और मेरठ के आठ-आठ फीसदी लोगों ने बताया कि वे भी नगर निगम के अस्पताल जाते हैं। सर्वे के ये आंकड़े नगर निगम के अस्पतालोंऔर डिस्पेंसरियों दोनों को मिलाकर तैयार किए गए हैं।
छोटे शहरों में बराबरी के हालात
प्रदेश के 5 से 10 लाख के आबादी के शहरों में निजी अस्पतालों और सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अंतर बहुत बड़ा नहीं है।
सर्वे में झांसी, गोरखपुर, अलीगढ़, मुरादाबाद जैसे शहरों में प्रतिभागियों ने अलग-अलग पैमानों पर लगभग एक जैसे अंक ही दिए हैं। झांसी में तस्वीर और भी चौंकाती है। वहां प्रतिभागियों ने माना है कि दवाओं की उपलब्धता सरकारी और निजी अस्पतालों में एक जैसी है। दोनों ही प्रकार के अस्पतालों को उन्होंने 7.2 अंक दिए हैं।