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अपराजिता: कैंटिन चलाकर आत्मनिर्भर बनीं कल्पना गुरंग

Tue, 12 Feb 2019 03:48 PM IST
ashok chauhan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हरीश चंद्र, अमर उजाला, धर्मशाला
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हौसला है तो मंजिल है। यह कहावत 61 साल की कल्पना गुरंग पर सटीक बैठती है। जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए) कार्यालय परिसर के छोटे से कमरे में कैंटीन चलाकर कल्पना गुरंग ने आत्मनिर्भर बनने की कहानी लिखी है।

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आंटी जी के नाम से मशहूर कल्पना चाय, दाल-चावल बनाती हैं। यहां अधिकारी, कर्मचारी और लाइब्रेरी में पढ़ाई करने वाले युवा आते हैं। धर्मशाला के दाड़ी की कल्पना गुरंग की तीन बेटियां हैं, सभी की शादियां हो चुकी हैं।

वे अपने-अपने परिवारों के साथ रहती हैं। चार साल से अकेले कैंटीन चलाकर अपना जीवन यापन कर रहीं कल्पना युवाओं के लिए भी मिसाल हैं। कार्य दिवस में सुबह साढे़ आठ से शाम छह बजे तक कैंटीन खुली रहती है। दिनभर में वह लगभग पंद्रह सौ से लेकर दो हजार रुपये की चाय, दाल-चावल बेचती हैं। 

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पांच साल पहले हुआ था पति का निधन

कल्पना गुरंग के पति नरेंद्र गुरंग की 2015 में लंबी बीमारी के चलते मौत हो गई थी। वर्ष 2005 में नरेंद्र डीआरडीए कार्यालय से चालक के पद से सेवानिवृत्त होकर कैंटीन चला रहे थे। उनकी मृत्यु के बाद कल्पना ने कैंटीन चलाने का जिम्मा संभाला।  

सातवीं कक्षा तक की है पढ़ाई 
कल्पना गुरंग ने कहा कि उसने सातवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। वह खुद हिसाब-किताब कर लेती है। उसने कहा कि जब तक सेेहत ठीक रहेगी, वह काम करती रहेंगी। 
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