हिमालय में होने वाली हलचलों को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है। यह कहना है पद्म विभूषण चंडी प्रसाद भट्ट का।
गांधी शांति पुरस्कार के लिए चयनित
गांधी शांति पुरस्कार के लिए चयनित पद्म विभूषण चंडी प्रसाद भट्ट पटना में राष्ट्रीय सेमिनार में भाग लेने के बाद शनिवार रात को गोपेश्वर पहुंचे। घर पहुंचने पर उनका जमकर स्वागत किया गया।
इस दौरान उन्होंने कहा कि हिमालय में होने वाली हलचलों के प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिकों को चिंतन करने की आवश्यकता है। वैज्ञानिक और तकनीकी ज्ञान के आधार पर ग्लेशियरों, हिमनदों और हिम तालाबों पर नीति निर्धारित की जानी चाहिए।
इससे आपदा के दुष्प्रभाव पर प्रभावी रोक लगाई जा सकती है। उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. आर चिदंबरम ने 11 अक्तूबर 2007 को ग्लेशियरों के अध्ययन के लिए एक समिति बनाई थी।
ईको सिस्टम प्रबंधन पर जोर
समिति ने मार्च 2011 में अपने सुझाव केंद्र सरकार को सौंपे थे। समिति ने सुझाव दिए थे कि हिमालयी क्षेत्र में विज्ञान का उपयोग, मानव संसाधनों का विकास, क्षेत्रीय योजना और ईको सिस्टम प्रबंधन आदि पर शीघ्र राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता है।
क्योंकि हिमालय के हिमनदों और नदियों से देश का 43 फीसदी हिस्सा प्रभावित हो रहा है। हिमनदों, हिम जलाशयों और बुग्यालों में होने वाली हलचलों का अध्ययन कर उसे स्थानीय लोगों, राज्य सरकारों को जानकारी देने के लिए उपक्रम स्थापित किया जाना चाहिए।
भट्ट को दी बधाई
पद्म विभूषित चंडी प्रसाद भट्ट का अंतरराष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार के लिए चयन पर नगर के लोगों ने मिष्ठान वितरण किया। रविवार को गोपेश्वर पहुंचे चंडी प्रसाद भट्ट का स्थानीय लोगों ने जोरदार स्वागत किया।
स्थानीय निवासी मनोज बिष्ट, अजय शाह, पीयूष विश्नोई, संजय डिमरी, विनय सेमवाल, आनंद बिष्ट आदि लोगों ने उन्हें बधाई दी।
पूर्व मुख्यमंत्री बीसी खंडूरी, राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामी नाथन, डॉ. पंजाब सिंह, केंद्र सरकार के सेक्रेटरी अरविंद बहुगुणा, बंगलूरू के वैज्ञानिक और पर्यावरणविद नवीन घोष सहित देश के कई वैज्ञानिकों ने भी श्री भट्ट को बधाई दी।