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उपभोक्ता अदालतों के फैसले अब इंटरनेट पर

Sun, 19 Jan 2014 12:52 PM IST
दीप सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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लोगों को अब किसी भी फैसले की नकल हासिल करने या तारीख पता करने केलिए उपभोक्ता अदालतों के चक्कर नहीं लगाने होंगे। सभी फैसले वेबसाइट पर उपलब्ध होंगे।
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इंटरनेट पर ही यह जानकारी भी मिल जाएगी कि कब कौन सा फैसला किस अदालत में लगा है। मुकदमे की अगली तारीख पता करने के लिए भी आयोग के चक्कर नहीं लगाने होंगे, इसकी डिटेल भी वेबसाइट पर मिल जाएगी।

राज्य उपभोक्ता आयोग ने तो इसकी शुरुआत कर दी है। सभी जिला उपभोक्ता फोरम को भी इस बाबत निर्देश दिए गए हैं। वहां भी इस तरह की तैयारी चल रही है।

उपभोक्ता अदालत की प्रक्रिया सामान्य अदालतों की तुलना में सरल होती है। सामान्य कोर्ट फीस जमा करनी होती है। उसके बाद हम वादी से दस्तावेज मांगते हैं। दूसरे पक्ष को बुलाते हैं।
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यदि वह उन दस्तावेजों को गलत नहीं बताता तो वही हमारे लिए सुबूत होते हैं। सब कुछ सामने है तो ज्यादा तकनीकी पक्ष में जाने की जरूरत नहीं होती। दोनों पक्षों को सुनते हैं और फैसला हो जाता है।

फिर भी बहुत से मामलों में काफी देर हो जाती है। जल्दी फैसले किए जाएं इसकेलिए हम कई प्रयास कर रहे हैं। लखनऊ, आगरा, गाजियाबाद, बरेली, मुरादाबाद जैसे बड़े शहरों में जिला स्तर पर दो-दो फोरम बनाए गए हैं।

जहां मुकदमें ज्यादा हैं, वहां हम अतिरिक्त बेंच बना देते हैं। जहां लंबित मुकदमे कम हैं, वहां से ही जजों को वहां भेज दिया जाता है जहां मुकदमें ज्यादा हैं। कार्यप्रणाली में भी बदलाव के प्रयास हो रहे हैं। मैं खुद सभी अदालतों का बीच-बीच में हालचाल लेता रहता हूं।

बिल्डरों व हाउसिंग अथॉरिटी से पीड़ित हैं लोग
बिल्डरों और सरकारी हाउसिंग अथॉरिटी से भी काफी लोग पीड़ित हैं। इस बीच ऐसे मुकदमे काफी बढ़े हैं। इसी तरह मेडिकल के मामले भी आ रहे हैं, जो पहले न के बराबर थे। पिछले माह ही बिल्डरों और हाउसिंग अथॉरिटी से जुड़े  25, मेडिकल के 16 मामले आयोग में आए।

स्टाफ की कमी नहीं
लखनऊ में दो उपभोक्ता अदालतें हैं। स्टाफ भी पर्याप्त है। कार्यप्रणाली ठीक हो तो आसानी से मुकदमे निपटाए जा सकते हैं। हां, यह जरूर है कि कुछ स्टाफ पुराना है। कुछ के बारे में शिकायत आती है कि वे कम्प्यूटर नहीं जानते या जानबूझकर काम नहीं करना चाहते।

यह काम तो फोरम के अध्यक्ष का है कि उनसे किस तरह काम लें। उनको प्रशिक्षण देने का प्रयास कर रहे हैं। नई भर्तियों में अनिवार्य योग्यता कंप्यूटर रखी जाएगी।

हर महीने लखनऊ के 20 मामलों पर अपील
लखनऊ के जिला फोरम से हर महीने लगभग 20 मामले आयोग में अपील केलिए आते हैं। यदि लगता है कि वास्तव में फैसले में कोई गलती हुई है तो फिर से सुनवाई करते हैं।

कई बार यह भी होता है कि जिसकेखिलाफ फैसला किया गया है, वह मुआवजे से बचने केलिए अपील कर रहा है। उसमें हम कहते हैं कम से कम 25 हजार या 50 प्रतिशत में जो कम हो, उतना मुआवजा पहले दे दे। उसके बाद ही हम निचली अदालत के फैसले पर सुनवाई करते हैं।

ऐसे करें अपील
यदि व्यक्ति ने कुछ खरीदा या सेवा प्राप्त की है और उससे जुड़ा कोई वादा पूरा नहीं होता तो वह उपभोक्ता अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। 20 लाख से कम मुआवजे केलिए जिला उपभोक्ता फोरम में मुकदमा करना होता है।

20 लाख से अधिक और एक करोड़ तक के लिए राज्य उपभोक्ता आयोग और उससे अधिक केलिए राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में मुकदमा करना होता है। यदि जिला फोरम केफैसले से कोई संतुष्ट नहीं है तो राज्य में और उससे भी संतुष्ट नहीं तो फिर राष्ट्रीय आयोग में अपील की जा सकती है।
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फोरम में कोई मुकदमा बहुत ज्यादा लंबित होता है तो वह भी आयोग में अपील कर सकता है। यदि हमें लगता है कि वाकई बेवजह देर हुई है तो उसकी भी सुनवाई आयोग कर सकता है।
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