12 जुलाई साल 2013 की रात। फारुख शेख और शबाना आजमी टैगोर थियेटर के स्टेज पर थे। दोनों ही थियेटर के मंझे कलाकार थे, लेकिन नाटक की वजह से मन में आशंका पैदा हो रही थी।
नाटक में कोई मूवमेंट नहीं थी। न ही कोई चहल-पहल। अपनी-अपनी सीट पर बैठकर दोनों कलाकार चिट्ठियों का अदान-प्रदान कर रहे थे। फिर उन चिट्ठियों के अनुसार ही बिना कुर्सियों से उठे अभिनय किया। जिन नाटकों में कोई चहल-पहल नहीं होती है तो ऐसे नाटकों में अक्सर दर्शक बोर हो जाते हैं। लेकिन, इस नाटक को लेकर लोगों में इतनी उत्सुकता थी कि नाटक शुरू होते ही लोग टकटकी लगाकर बैठ गए।
नाटक में दोनों के संवादों व भावों में इतनी ताजगी और संजीदगी थी कि जो जैसे बैठा था, वो आखिरी समय तक अपनी जगह से हिला तक नहीं। नाटक कब खत्म हो गया लोगों को पता हीं नहीं चला।
फारुख शेख साहब का कुछ ऐसा ही जादू था। चंडीगढ़ में तुम्हारी अमृता उनका आखिरी नाटक था। यह नाटक उन्होंने शबाना आजमी के साथ प्ले किया था।
फारुख शेख के निधन पर ये बाते टैगोर थियेटर के डायरेक्टर कुलदीप शर्मा ने साझा की। उनके मुताबिक, दर्शकों को जो अपने इशारे पर चलाए वही असली आर्टिस्ट होता है। शेख को यह कला अच्छी तरह से आती थी। कभी भी उनके अंदर गुरूर नहीं देखा गया। वे पूरी तरह से नेचुरल एक्टर थे। जमीन से जुड़े थे। उर्दू में उनकी बहुत अच्छी पकड़ थी।
जसपाल भट्टी की टीम के फैन थे
टैगोर थियेटर से जुड़े आर्टिस्ट व शर्मा ने बताया कि वे जसपाल भट्टी की टीम के बहुत बड़े फैन थे। चमत्कार सीरियल में उन्होंने टीम का काम देखा था।
उस वक्त शर्मा भी एपिसोड आर्टिस्ट के तौर पर काम करते थे। उन्होंने बातचीत के दौरान बताया था कि जसपाल भट्टी व उनकी टीम भ्रष्टाचार के खिलाफ जो काम कर रही है, वो काबिले तारीफ है। उनकी इस प्रशंसा से पूरी टीम को बहुत ऊर्जा मिलती थी।
चंडीगढ़ में प्रोफेशनल थियेटर के पक्ष में थे
वे कई बार चंडीगढ़ थियेटर करने आए थे। हर बार वे यहां पर प्रोफेशनल थियेटर की बात पर जोर देते थे। उनका कहना था कि मुंबई में उन्होंने प्रोफेशनल थियेटर शुरू किया।
लोग टिकट खरीदकर ही नाटक देखते हैं, इससे आर्टिस्टों को किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ता। चंडीगढ़ में थियेटर के लिए कोई टिकट नहीं है। उन्होंने कहा था कि वे हैरान है कि यहां पर टिकटों पर थियेटर नहीं होता।