सर्वे में ये बात सामने आई कि प्रदेश की 28 प्रतिशत शहरी आबादी को पीने का पानी उनके अपने घरों में नहीं मिलता। बाहर निकलना पड़ता है। शहरी इलाकों में सिर्फ आधी आबादी यानी 50 प्रतिशत लोगों के पास घरों में पानी का साधन है।
तीन प्रतिशत आबादी पानी खरीदकर गुजारा करती है। पानी खरीदने के मामले में प्रदेश में आगरा की स्थिति सबसे खराब है। वैसे आगरा ऐसा शहर है, जिसका जिक्र पर्यटन के हर नक्शे में जरूर होता है, लेकिन इस शहर में 23 प्रतिशत आबादी पीने का पानी खरीदकर गुजारा कर रही है। हालांकि शहर में महज 53 फीसदी लोग ऐसे हैं, जिनके घर में पानी का साधन मौजूद है। लेकिन 24 फीसदी लोग सार्वजनिक नल/हैंडपंप से पानी लेते हैं।
जिन शहरों में सर्वे हुआ उनमें से बहुत से शहरों में पीने के पानी की सरकारी आपूर्ति बहुत कम है, लेकिन पानी खरीदने जैसी नौबत वहां नहीं है। मसलन कानपुर, बरेली और मुरादाबाद में क्रमश: 44, 24 और 32 फीसदी लोगों को ही घरों में सरकारी आपूर्ति का लाभ मिलता है, लेकिन शहरों की शेष आबादी निजी साधनों या सार्वजनिक नलों/हैंडपंप या नगरनिगम के टैंकरों से अपनी जरूरत पूरा कर लेती है।
सरकारी आपूर्ति की स्थिति इलाहाबाद और मेरठ जैसे शहरों में अच्छी है, जहां 90 फीसदी से ज्यादा लोगों ने कहा कि उन्हें सरकारी नलों का पानी घर पर मिल जाता है। सार्वजनिक नलों या हैंडपंप की बात करें, तो इन्हीं दोनों शहरों में सबसे कम पीने के पानी के सार्वजनिक साधन उपलब्ध हैं।
बरेली में सबसे अधिक, 61 फीसदी लोगों के घरों में निजी हैंडपंप हैं जबकि मुरादाबाद में यह प्रतिशत 32 है। लखनऊ और इलाहाबाद मेंनिजी हैंडपंप सबसे कम हैं, सिर्फ एक प्रतिशत।