पंकज शर्मा/सत्येंद्र श्रीवास्तव
बड़ोखर खुर्द
(बांदा)। अंबेडकरवाद और मार्क्सवाद से संबद्ध समसामयिक विषयों पर तीन दिन
तक चली राष्ट्रीय कार्यशाला चार प्रस्ताव पारित करने के साथ खत्म हो गई।
अंतिम
दिन पेश किए गए प्रस्ताव में दलितों पर बढ़ती हिंसा, अभिव्यक्ति की आजादी
और महिलाओं पर हो रहे हमलों को रोकने की केंद्र सरकार से पुरजोर मांग की
गई। इसके अलावा मारल पुलिसिंग के खिलाफ देश के शीर्ष विचारकों और लेखकों ने
आवाज उठाई।
जनवादी लेखक संघ के तत्वावधान में दो अक्तूबर को शुरू
हुई कार्यशाला रविवार शाम कार्यशाला संचालक बजरंग बिहारी और संजीव कुमार के
प्रतिवेदन पारित होने के साथ समाप्त हो गई। कार्यशाला के अंतिम दिन पहला
प्रस्ताव संचालक बजरंग बिहारी ने पेश किया।
इसमें कहा गया दलितों
पर बढ़ रही हिंसा पर सरकार सख्ती बरत उन्हे न्याय दिलाए। जनवादी लेखक संजीव
कुमार के दूसरे प्रस्ताव में पोंगापंथियों के अभिव्यक्ति की आजादी पर
बढ़ते हमलों की निंदा की गई। प्रो.एमएम कलबुर्गी सहित कई नामचीन शख्सियतों
की हत्याओं का जिक्र करते हुए कहा लेखकों को लिखने से रोका जा रहा है।
प्रस्ताव
में कहा गया भाजपा सरकार आने के बाद दकियानूसों के हौसले बढ़े हैं। इसके
अलावा दो अन्य पारित प्रस्तावों मेें महिलाओं पर हो रहे हमलों पर विरोध
जताया गया। साथ ही मारल पुलिसिंग के खिलाफ भी प्रस्ताव पास हुआ।
कार्यशाला
संयोजक सुधीर सिंह और जनवादी लेखक संघ अध्यक्ष केशव तिवारी तथा प्रमुख
मेजबान प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह, उमाशंकर परमार, नारायणदास गुप्त, पीके
सिंह व पंकज गुप्ता आदि ने मेहमान लेखकों और विचारकों का आभार जताया। सभी
मेहमानों को शाल ओढ़ाकर सम्मानित किय गया।
राष्ट्रीय कार्यशाला
में अंतिम दिन रविवार को मुंबई (महाराष्ट्र) से आए प्रमुख दलित आलोचक विलास
सोनवणे ने कहा कि वह डॉ. अंबेडकर की अपेक्षा महात्मा फुले और कोबरागढ़े से
ज्यादा सहमत हैं।
अंबेडकर स्कालरशिप लेकर पढ़े हैं। जबकि बैरिस्टर
कोबरागढ़े ने अपने अधिकार से पढ़ा है। दलितों, गरीबों और पिछड़ों का जिक्र
करते हुए कहा कि जमींदारी प्रथा हावी रही। पानी मेें भी अछूतों को
अत्याचार सहना पड़े। सोनवणे ने कहा कि हार्दिक पटेल जाति आधारित आंदोलन कर
रहा है।
वह 27 करोड़ के लिए आरक्षण मांग रहा है। इसमें मराठा,
गुर्जर, जाट और पटेल आदि शामिल हैं, जबकि मुलायम, मायावती, लालू और नीतीश
का आंदोलन जातियों के लिए अपने लिए है। उन्होंने कहा कि पूंजीवाद आदमी को
बेगाना बना देती है। जातिवाद पूंजीवाद की देन है।
जाति आधारित बात
करके कई पार्टियां सत्ता में आ गईं। बाद में उन्होंने अपना मुद्दा विकास
बता दिया। उन्होंने कहा कि कई प्रांतों में आदिवासियों का बुरा हाल है।
अत्याचार के खिलाफ ही वह माओवादी हो गए।
माओवादियों के खिलाफ
दलितों को इस्तेमाल हो रहा है। अंत में उन्होंने कहा कि एकजुटता के बगैर
विचारक और संगठन बदलाव की क्रांति नहीं ला सकते। विलास सोनवणे 1973 से 78
तक मार्क्सवादी रहे। बाद में जाति के सवाल पर उन्हें 1979 मेें उन्हें
पार्टी से निकाल दिया गया।