उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने और धन के अभाव में किसी की पढ़ाई न छूटे, इसके लिए सरकार की ओर से बैंकों को शिक्षा लोन देने का निर्देश है। मगर बैंक विद्यार्थियों को लोन बांटने में उदासीन हैं। यही कारण है कि जिले भर में विभिन्न बैंकों ने नाममात्र के लोन बांटे हैं। वहीं लोन लेने की प्रक्रिया की जटिलता के चलते छात्र भी लोन लेने नहीं आते हैं। शिक्षा लोन लेने के लिए बैंक की तरफ से तमाम औपचारिकताएं पूरी कराई जाती हैं। ऋण की राशि के लिए बैंक ने स्लैब बनाए हुए हैं। इसमें चार लाख तक के लोन के लिए कोई गारंटी की जरूरत नहीं है।
चार से साढ़े सात लाख तक के ऋण के लिए गारंटी चाहिए होती है। इसमें थर्ड पार्टी की जरूरत पड़ती है। साढ़े सात लाख या इससे ऊपर ऋण चाहने वाले विद्यार्थियों से सिक्योरिटी की जरूरत होती है। इसके तहत सिक्योरिटी के रूप में प्रापर्टी या लिक्विड सिक्योरिटी एफडीआर, एलआईसी पॉलिसी आदि चाहिए होती है। इसलिए 80 फीसदी विद्यार्थी चार लाख रुपये लोन लेना ही पसंद करते हैं।
मगर इस लोन को बैंक देने से बचते हैं। क्योंकि इसमें ऋण के सापेक्ष बैंक के पास लोन के लाभार्थी का कुछ नहीं होता है, जिससे रिकवरी हो सके। इस लोन को लेने वाले विद्यार्थी कॉलेज से पास आउट होकर चले जाते हैं। बाद में उनका कुछ पता नहीं चलता है। जिला अग्रणी बैंक आंकड़ों के मुताबिक 31 दिसंबर 2017 तक 2965 विद्यार्थियों द्वारा लोन लिया गया था। इसमें 12134 लाख रुपये बैंक ने कर्ज के रूप में बांटे हैं।
बैंकों की ज्यादा से ज्यादा कोशिश रहती है कि वे लोन बांटे, शिक्षा लोन के मामले में इसे और ज्यादा बढ़ाने प्रयास रहता है, ताकि शिक्षा को बढ़ावा मिले।
ओपी वढेरा, एलडीएम