आर्ट ऑफ लिविंग के वृहत वैश्विक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजन की मंजूरी वैध है या अवैध। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में इसी पहलू पर सफाई देते हुए दिल्ली विकास प्राधिकरण ने कई बार अपने ही तथ्यों और बयानों का खंडन किया।
वहीं सुनवाई के दौरान बेंच ने आयोजन की मंजूरी से जुड़े कई सवाल डीडीए से पूछे। बेंच ने डीडीए से पूछा कि आपने इतने विशाल आयोजन का अवलोकन किए बिना ही मंजूरी क्यों दे दी। इस पर डीडीए ने कहा कि उन्हें कार्यक्रम की विशालता का आभास नहीं था।
बेंच ने इस जवाब पर प्राधिकरण को फटकार भी लगाई। वहीं एक दूसरे सवाल पर भी डीडीए की ओर से जुदा तथ्य सामने आया। बेंच ने पूछा कि आपने पश्चिमी यमुना डूब क्षेत्र में पार्किंग के लिए 3.3 हेक्टेयर, बैठक के लिए 20 हेक्टेयर व एक हेक्टेयर जमीन स्टेज के लिए दिया है।
इस पर डीडीए ने कहा कि उन्होंने पार्किंग के लिए कोई जगह नहीं दी है। सिर्फ कार्यक्रम के लिए जगह दी गई है। वहीं सुनवाई के दौरान यह भी तथ्य सामने आया कि डीडीए के मंजूरी पत्र में आवंटित जगह का दायरा भी स्पष्ट नहीं है।
जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने बृहस्पतिवार को याची मनोज मिश्रा, पर्यावरणविद आनंद आर्या और एडवोकेट प्रदीप कुमार त्यागी की याचिका पर लगातार तीसरे दिन सुनवाई की।
बेंच मामले की अगली सुनवाई 7 या 8 मार्च को कर सकता है। वहीं सुनवाई के दौरान याची मनोज मिश्रा ने कहा कि यमुना किनारे मलबा डंप किए जाने का वीडियो साक्ष्य भी उनके पास मौजूद है।
पूरे मामले में डीडीए खुद का बचाव करता हुआ दिखा। सुनवाई के दौरान डीडीए की ओर से पेश एडवोकेट राज कुमार बंसल ने कहा कि उन्होंने मास्टर प्लान 2021 के तहत जिस इलाके में मंजूरी दी है वह जोन-ओ में आता है।
यह मंजूरी रीक्रिएशन के लिए दी गई थी। यह यमुना डूब क्षेत्र का प्रतिबंधित नहीं अधिकृत क्षेत्र है। हमने सिर्फ मंजूरी दी है। इस मामले में करीब 21 संस्थाओं के जरिये मंजूरी दी जानी है। कुछ मंजूरी अब भी बाकी होंगी। अकेले डीडीए ने यह मंजूरी नहीं दी।