जनगणना 2011 में लिंग की जानकारी के लिए अलग खाना हासिल करने के बाद किन्नरों को पहली बार उत्तराखंड में उच्च शिक्षा हासिल करने के दौरान भी अपनी अलग पहचान दर्ज कराने का हक मिला है।
श्री गुरु रामराय (एसजीआरआर) पीजी कॉलेज ने आवेदन फार्म में ट्रांसजेंडर (किन्नर) छात्रों के लिए लिंग कालम में अलग से खाना दिया है।
कॉलेज में पहली बार किन्नरों को भी अलग पहचान दी जा रही है। कार्यवाहक प्राचार्य डॉ. अतुल गुप्ता ने बताया कि भारत की जनगणना में किन्नरों को यह अधिकार मिलने के बाद कॉलेज प्रशासन ने भी यह फैसला किया है।
ओएमआर शीट पर होगा ट्रांसजेंडर का कॉलम
प्राचार्य ने बताया कि ओएमआर शीट पर अलग से ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए कॉलम दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि अब तक फार्म पर सिर्फ मेल या फीमेल का ही ऑप्शन होता था।
ऐसे में इस तरह के छात्रों को भी इन दोनों में से कोई विकल्प चुनना पड़ता था। अब वे गलत पहचान ओढ़ने के लिए मजबूर नहीं होंगे।
डॉ. गुप्ता ने कहा कि पहचान जाहिर करने का दूसरा फायदा यह होगा कि केंद्र या राज्य सरकार की ओर से किन्नरों के लाभ के लिए शुरू की जाने वाली किसी योजना में शामिल होने के लिए उन्हें मशक्कत नहीं करनी होगी।
सामान्य छात्रों की तरह ही होगा व्यवहार
कार्यवाहक प्राचार्य ने कहा कि कॉलेज में अलग पहचान भरने का यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि इन छात्रों को सामान्य छात्रों से अलग रखा जाएगा।
बताया कि सामान्य छात्रों के अनुरूप ये छात्र भी कालेज में चल रही विभिन्न छात्रवृत्ति या अन्य योजनाओं का पूरा लाभ ले सकेंगे। कहा कि अब तक किसी दूसरे संस्थान ने यह व्यवस्था नहीं दी है।
इस बार आवेदन के लिए ओएमआर
एसजीआरआर कॉलेज ने इस बार दाखिला प्रक्रिया में एक और खास कदम उठाया है। कॉलेज दाखिला प्रक्रिया को कंप्यूटरीकृत करने जा रहा है। ओएमआर शीट उन्हीं छात्रों को दी जाएगी, जिनका नाम मेरिट में आ जाएगा।
छात्रों को अपने प्रमाणपत्र दिखाने पर यह शीट मिलेगी। इसमें छात्र के नाम पते से लेकर जाति, मोबाइल नंबर, कोर्स का भी पूरा विवरण देना होगा। इससे एडमिशन प्रक्रिया आसान हो जाएगी, जबकि छात्रों को कंप्यूटराइज आई कार्ड भी मिल जाएगा। इसके अलावा एक क्लिक पर छात्र की पूरी डिटेल आसानी से उपलब्ध हो जाएगी।
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक
अभी तक मेल या फीमेल के नाम से पहचान रखी जाती थी। ऐसे में ट्रांसजेंडर को अपने साथ शामिल करने में दूसरे लिंग के लोग कुछ दिक्कतें महसूस करते थे। दूसरी ओर, ट्रांसजेंडर को भी महिला या पुरुष न होने के बावजूद जबरन इसकी पहचान खुद पर थोपी हुई सी लगती है।
विदेशों में भी जेंडर की अलग पहचान रखी जाती है। ऐसे में दून के कालेज में अलग पहचान देने का कदम बेहतर है। इससे ऐसे लोगों की मानसिक दशा पर भी सकारात्मक असर पड़ता है।
-डा. वीना कृष्णन, साइकोलॉजिस्ट