देहरादून में बेहतर भविष्य के सपनों के साथ एक छात्र ने औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) में दाखिला लिया। तीन साल तक पेपर दिए, मार्कशीट मिली और अप्रेंटिस भी की।
अयोग्य घोषित कर दिया
लेकिन इससे पहले कि वह कहीं नौकरी हासिल करता, संस्थान ने उसे कोर्स के लिए ही अयोग्य घोषित कर दिया। अब दस साल से यह छात्र न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है।
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अनिल कंडवाल (35) निवासी रेसकोर्स ने वर्ष 2001 में आईटीआई निरंजनपुर में ड्राफ्ट्समैन मैकेनिकल ट्रेड में दाखिला लिया। इसके लिए अनिल ने प्रवेश परीक्षा दी थी। तीन साल तक पढ़ाई के बाद अनिल को मार्कशीट भी मिल गई।
इसके बाद संस्थान के निर्देश पर अनिल ने एक निजी कंपनी में अप्रेंटिस की, लेकिन लौटकर आए तो पता चला कि वह इस कोर्स के योग्य नहीं हैं।
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संस्थान ने एनसीवीटी प्रशिक्षण नियमावली स्पेडिक्स एक्सवीआईवी पैरा 43 के तहत अनिल को बताया कि इस ट्रेड में दाखिले के लिए दसवीं विज्ञान वर्ग से उत्तीर्ण होना जरूरी है, जबकि अनिल कला वर्ग के छात्र रहे थे।
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इस आधार पर संस्थान ने अनिल को प्रमाणपत्र जारी नहीं किया। खास बात यह है कि अनिल के दाखिले के वक्त उनके सभी प्रमाणपत्रों की पूरी जांच की गई थी। यानी गलती अनिल की नहीं, संस्थान की ही थी। लेकिन सजा दस साल बाद भी अनिल भुगत रहे हैं।
कोई कार्रवाई नहीं हुई
उन्होंने बताया कि वह उच्चाधिकारियों से लेकर सीएम तक गुहार लगा चुके हैं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। प्रमाणपत्र न मिल पाने के कारण अनिल कोर्स करने के बावजूद इस ट्रेड से संबंधित नौकरियों के लिए आवेदन नहीं कर पा रहे हैं।
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पहले विज्ञान वर्ग की बाध्यता थी। पिछले साल ही इसमें बदलाव कर किसी भी वर्ग में दसवीं पास होने का नियम आया है। छात्र को दाखिला मिला तो इसमें उसकी कोई गलती नहीं है। छात्र को मार्कशीट जारी हो चुकी है तो प्रमाणपत्र भी मिलना चाहिए।
- एके त्रिपाठी, प्राचार्य, आईटीआई निरंजनपुर