राज्य सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में खेलों के विकास का दावा भले करती हो, लेकिन सचाई यह है कि पांच साल में पाइका के तहत स्वीकृत 2279 मैदानों में से 1479 ही बन सके हैं। एकमात्र बागेश्वर जिले में तीन साल में पूरे मैदान बनाए गए हैं, बाकी सभी जगह इंतजार जारी है। ऐसे में गांवों के उदीयमान खिलाड़ी कैसे सचिन और साइना जैसा जौहर दिखा सकेंगे, यह सवाल उठ रहा है।
ग्रामीण अंचल के खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने और खेल सुविधा देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने वर्ष 2008-09 में पंचायत युवा क्रीड़ा एवं खेल अभियान (पाइका) की शुरुआत की। इसके तहत हर गांव में खेल मैदान के लिए एक लाख रुपये का बजट रखा गया, जिसमें 90 प्रतिशत खर्च केंद्र और दस प्रतिशत राज्य सरकार को देना था।
मानकों का कोई ख्याल नहीं
उत्तराखंड में योजना की शुरुआत काफी उत्साह से हुआ, लेकिन सुस्त चाल के चलते पांच साल में प्रस्तावित 2279 मैदानों में से 1479 मैदान ही बन सके। जो मैदान बने भी हैं, उनमें मानकों का कोई ख्याल नहीं रखा गया है। कहीं 10 गुणा 20, तो कहीं 20 गुणा 30 और कई जगह 40 गुणा 60 के आकार में मैदान बनाए गए। ऐसे में एथलेटिक्स, फुटबाल जैसे खेलों के लिए ये मैदान बेकार साबित हो रहे हैं।
कहां क्या स्थिति
जिला - प्रस्तावित - बने
बागेश्वर - 121 - 121
चंपावत - 90 - 78
रुद्रप्रयाग - 106 - 81
नैनीताल - 141 - 109
हरिद्वार - 112 - 70
उत्तरकाशी - 155 - 108
देहरादून - 128 - 56
चमोली - 183 - 109
पिथौरागढ़ - 225 - 140
टिहरी - 301 - 189
पौड़ी - 364 - 242
अल्मोड़ा - 237 - 105
योजना के तहत जिन मैदानों के लिए राशि आई है और जगह तय है, वहां निर्माण होना चाहिए। ग्रामीण खेलों को बढ़ावा देने के लिए मैदानों को जल्द बनाने के लिए अधिकारियों को निर्देश दिए जाएंगे।
-दिनेश अग्रवाल, खेल मंत्री
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