पंजाब यूनिवर्सिटी (पीयू) अब गॉड पार्टिकल की खोज के बाद दुनिया के सबसे बड़े फिजिक्स रिसर्च प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने जा रही है। इसके तहत शिकागो स्थित फर्मी लैब में न्यूट्रिनो कण पैदा किए जाएंगे।
पीयू को इस प्रोजेक्ट के लिए नोडल सेंटर बनाया गया है, जिसे हाई एनर्जी फिजिक्स डिटेक्टर्स और उपकरण तैयार करने में मुख्य भूमिका निभानी होगी। पीयू के फिजिक्स विभाग के प्रो. विपिन भटनागर को इस प्रोजेक्ट का प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर नियुक्त किया गया है।
न्यूट्रिनो के निर्माण का प्रोजेक्ट कुल 2 अरब डालर का है। यह 2023 तक चलेगा। इस प्रोजेक्ट के तहत पीयू को दो चरण में ग्रांट मिलेगी। पहले चरण में 30 करोड़ का बजट दिया गया है जबकि दूसरे चरण में करीब 300 करोड़ का ग्रांट मिलने की उम्मीद है।
पीयू को मिलेगी इंटरनेशनल पहचान
इस प्रोजेक्ट में पीयू और देश की अन्य प्रतिष्ठित रिसर्च सेंटर से करीब 15 वैज्ञानिक जुड़े हैं। पीयू के कुलपति प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर के अनुसार, पीयू को सेंटर बनाए जाने से इंटरनेशनल स्तर पर पहचान मिलेगी।
दो तरह के डिटेक्टर लगेंगे
शिकागो स्थित फरमी लैब में दो तरह के डिटेक्टर स्थापित होंगे। नियर डिटेक्टर की जिम्मेदारी भारतीय वैज्ञानिकों को दी गई है। इस प्रोजेक्ट में डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (डीएसटी) और डिपार्टमेंट ऑफ एटोमिक एनर्जी सेंटर (डीएटी) मिलकर काम करेंगे। पहले चरण की अवधि तीन साल होगी।
प्रो. विपिन ने बताया कि पहला चरण सफल होने के बाद पीयू में ही इंटर इंस्टीट्यूटशनल सेंटर फॉर फिजिक्स साइंसेज स्थापित किया जाएगा। इस सेंटर के बनने से देश भर के अन्य रिसर्च सेंटर जुड़ेंगे और नए प्रोजेक्ट के लिए कार्डिनेट कर सकेंगे।
नंबर वन रैंकिंग से पीयू बनी पहली पसंद
कुलपति प्रो. अरुण कुमार ग्रोवर के अनुसार पिछले दो सालों में पीयू की टॉप रैंकिंग से भी पीयू को न्यूर्टिनो फिजिक्स प्रोग्राम के लिए नोडल सेंटर चुनने में मदद मिली है।
प्रोजेक्ट में आईआईटी गोवहाटी, दिल्ली यूनिवर्सिटी, हरीशचंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट इलाहाबाद और दूसरे ग्रुप में भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर और वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रोन सेंटर शामिल हैं। प्रो. विपिन ने बताया कि पीयू में आर एंड डी पर काम शुरू कर दिया गया है।
क्या होते हैं न्यूट्रिनो
एक ऐसा अति सूक्ष्म कण, जिस पर कोई आवेश नहीं होता। जब किसी परमाणु से कोसमिक किरण टकराती है तो इसका निर्माण होता है। सूर्य जैसे तारे पर जहां लगातार नाभकीय क्रियाएं चल रही हैं, वहां उत्पन्न होने वाले 65 अरब न्यूट्रीनो प्रति सेकेंड धरती के हर वर्ग सेंटीमीटर से होकर गुजरते हैं। 1942 में वांग गंचेंग ने न्यूट्रिनो की ब्रह्माण में उपस्थिति का दावा किया था, इसके लिए 1995 में उन्हें नोबेल मिला।