देखिए...। हमने तो चाय और कॉफी आपकी टेबल पर रख दी है...। अब अभिभावक पर है कि वह चाय का मतलब (नॉन मॉडल स्कूल) या कॉफी का मतलब (मॉडल स्कूल) का चयन करते हैं । जरूरी नहीं है कि हर बच्चा मॉडल स्कूल में पढ़ाया जाए।
हिंदी और पंजाबी बोलने वाले अभिभावक को भी अपना बच्चा अंग्रेजी में पढ़ाना है तो बताइए कैसे बच्चा अंग्रेजी मतलब मॉडल स्कूल में पास हो पाएगा, जिसके घर पर पंजाबी या हिंदी भाषा अधिक बोली जाती है। कुछ इस तरह के तर्क देते हुए डिप्टी डायरेक्टर (स्कूल) चंचल सिंह ने अभिभावकों के साथ बैठक की। जो उनके पास नौवीं कक्षा में फेल बच्चों को री-अपीयर एग्जाम की तारीख बढ़ाने का आग्रह करने पहुंचे थे।
जवाब में ऑल इंडिया स्टूडेंट काउंसिल की नवकिरण ने उनसे पूछा कि ‘इसका मतलब है कि हिंदी और पंजाबी बोलने वाले मां-बाप को बच्चों का अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने का हक नहीं है’। यह सुनकर डिप्टी डायरेक्टर (स्कूल) थोड़े से हकला गए।
उन्होंने कहा कि मैं बस एक उदाहरण दे रहा हूं। आप ज्ञापन दे दीजिए, हम देखते है क्या हो सकता है। करीब 10 मिनट तक चली बैठक में उन्होंने स्कूलों की शिक्षा प्रणाली की वर्तमान स्थिति से खुद को अनजान ही जताया और स्लीप पर एक दो कमी लिखते रहे।
बच्चों के अचानक इतने संख्या में फेल होने के कारण पर भी डिप्टी डायरेक्टर (स्कूल) ने कहा कि वह जांच करवाएंगे। साथ ही सारी गलतियां स्कूल में विद्यार्थियों की एटेंडेंट्स में आ रही गिरावट पर थोप दी।
उन्होंने कहा कि सीबीएसई केनियम के अनुसार जो सही होगा, वह ही किया जाएगा। बैठक में अभिभावकों को गरम होते और शिक्षा विभाग एवं स्कूल की कमियां के उजागर होते देखकर वह अपनी घड़ी देखने लगे और अभिभावकों को दस मिनट बाद भेज दिया गया।
सुबह से शुरू हुई हलचल
डीपीआई दफ्तर सेक्टर-9 की पार्किंग में सौ से अधिक अभिभावकों और पत्रकारों को उनका इंटरव्यू लेते देखकर सोमवार को डीर्पीआई दफ्तर में सुबह दस बजे से ही हलचल शुरू हो गई। नीचे सब इंस्पेक्टर अभिभावकों को हटाने आए तो वे बिना डीपीआई से मिले वापस जाने को राजी नहीं हुए। तो तय हुआ कि अभिभावकों से मात्र पांच लोग ही मिल पाएंगे। डीपीआई नहीं मिले तो डिप्टी डायरेक्टर (स्कूल) से उन्हें मिलाया गया।
कोट्स
डिप्टी डायेक्टर स्कूल चंचल सिंह ने चाय और कॉफी का उदाहरण देकर यह समझने की कोशिश की है कि हिंदी और पंजाबी बोलने वाले अभिभावकों को अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूलों में एडमिशन नहीं करवानी चाहिए। यह बात बैठक में कहने लायक नहीं थी। उन्होंने इधर-उधर के तर्क देकर अपनी बात को साबित करने की कोशिश की। वह खुद अपने ही तर्क पर सही साबित नहीं हुए।
कंवलजीत सिंह, सचिव, सीपीआई एमएल लिबरेशन
मेरा कहने का मतलब लेंग्वेज के चयन पर था। यदि हमारी मात्र भाषा हिंदी है तो बच्चे की बेहतर अचीवमेंट हिंदी मीडियम में होगी। मेरा मतलब हिंदी, पंजाबी और अंग्रेजी मीडियम को लेकर था। हम किसी बच्चे को मीडियम के चयन को लेकर कोई दबाव नहीं डाल रहे। मैं बस उन्हें समझा रहा था। यह सिर्फ एक उदाहरण था। स्कूल में बच्चों का दसवीं तक मीडियम हिंदी होता है और ग्यारहवीं और बारहवीं में अंग्रेजी मीडियम में पढ़ाई करते है, जिस वजह से वह अधिक दिक्कत महसूस कर रहे हैं। इसलिए मीडियम का चयन सही होना चाहिए।
चंचल सिंह, डिप्टी डायरेक्टर, स्कूल