विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को नॉन नेट फेलोशिप बंद करने के मुद्दे पर सफाई की है। यूजीसी ने कहा है कि पहले से पंजीकृत छात्र इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे, जबकि नए आवेदकों को फेलोशिप नहीं दी जाएगी। यूजीसी ने तर्क दिया है कि नेट फेलोशिप और नॉन नेट फेलोशिप को लेकर भेदभाव होने की बात सामने आ रही थी।
नॉन नेट फेलोशिप को लेकर कोई समान मानदंड भी नहीं बने थे, जबकि इस संबंध में पारदर्शिता भी नहीं थी। यूजीसी ने मंत्रालय को बताया है कि वह नेट फेलोशिप के दायरे को केंद्रीय विश्वविद्यालय से बढ़ाकर राज्य के विश्वविद्यालयों में भी लागू करने पर विचार कर रही है। इसके लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित की गई है।
वहीं मंत्रालय ने अनौपचारिक तौर पर कहा है कि इस फैसले में उसकी कोई भूमिका नहीं है। यूजीसी ने यह फैसला स्वतंत्र तौर पर लिया है। यूजीसी ने मंत्रालय से कहा है कि एक समान मानदंड नहीं होने की वजह से हर विश्वविद्यालय अपने हिसाब से नॉन नेट फेलोशिप को लागू कर रहा था।
यूजीसी ने कहा कि फंड को लेकर पारदर्शिता भी नहीं थी। पिछले साल 99 करोड़ रुपये दिए गए। मगर अभी तक विश्वविद्यालयों की ओर से यह जानकारी नहीं दी गई है कि यह पैसा उनके पास है या फिर स्कॉलर को दिया गया। यूजीसी का कहना है कि पारदर्शिता नहीं होने की वजह से भी इसे बंद किया गया।
यूजीसी ने कहा है कि अभी सिर्फ केंद्रीय विश्वविद्यालय में यह लागू है यानी सिर्फ तीन प्रतिशत विश्वविद्यालयों में ही लागू है। अगर इसे राज्यों के विश्वविद्यालयों में लागू किया जाता है तो बाकी 97 फीसदी हिस्से में भी लागू हो जाएगा और इसका फायदा छात्रों को होगा।