लखनऊ विश्वविद्यालय में एमबीए डिपार्टमेंट में रीडर से प्रोफेसर पद पर प्रमोशन पाने वाले डॉ. नीरज कुमार पर साहित्यिक चोरी का आरोप सही पाया गया है।
उन्होंने हावर्ड यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल के एक प्रोफेसर की वर्ष 1965 में लिखी गई किताब से कंटेंट चुराकर अपना शोध-पत्र तैयार किया और इसके बाद कॅरिअर एडवांसमेंट स्कीम के तहत उन्होंने प्रमोशन हासिल कर लिया।
यही नहीं, लखनऊ विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने भी इन्हें प्रोन्नति देने में जल्दबाजी की। मामला संदिग्ध होने के बावजूद इन्हें प्रमोशन दे दिया गया।
अब राजभवन ने इस मामले पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कुलपति डॉ. एसबी निमसे को एक महीने के भीतर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। फिलहाल लविवि प्रशासन ने कार्यपरिषद की आपात बैठक बुलाई है। अब इसमें डॉ. नीरज पर कार्रवाई होगी और वे प्रोफेसर से डिमोट होकर रीडर रह जाएंगे।
लविवि में एमबीए विभाग के रीडर डॉ. नीरज कुमार ने कॅरिअर एडवांसमेंट स्कीम के तहत प्रमोशन पाने के लिए तीन किताबें और दो शोध-पत्र प्रस्तुत किए।
उन्होंने अपने शोध-पत्र में हावर्ड यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर अब्राहम जॉर्जमन की किताब ह्यूमन डेलिमास ऑफ रीडरशिप, जो वर्ष 1965 में प्रकाशित हुई थी, से कंटेंट चोरी कर शामिल किए थे।
उस समय चयन समिति के सदस्य प्रो. जेके शर्मा ने इस पर आपत्ति भी उठाई थी मगर डॉ. नीरज कुमार को कार्यपरिषद ने 3 जुलाई 2012 को प्रोफेसर पद पर प्रोन्नत कर दिया और आगेे जांच करवाने के आदेश दिए। इसके बाद आईआईटीआर के डायरेक्टर डॉ. केसी गुप्ता की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई।
एसजीपीजीआई परिसर में स्थित बायो मैग्नेटिक रेजोनेंस इंस्टीट्यूट के संस्थापक सीएल खेत्रपाल और एनबीआरआई के डायरेक्टर डॉ. सीएस नौटियाल को इसका सदस्य बनाया गया।
कमेटी ने 25 जनवरी 2013 को अपनी रिपोर्ट सौंपी जिसमें डॉ. नीरज को साहित्यिक चोरी का दोषी माना गया। हैरानी इस बात की भी कि अब तक डॉ. नीरज पर लविवि प्रशासन ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। अब इस मामले पर राज्यपाल बीएल जोशी ने कड़ा रुख अख्तियार करते हुए इन पर एक महीने में कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।