जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का कैंपस बेशक वाई-फाई से लैस हो चुका हो, लेकिन छात्रसंघ चुनाव आज भी 44 साल पुराने ढर्रे पर ही लड़े जाते हैं। प्रत्येक छात्र संगठन महज हजार से दो हजार रुपये चुनाव प्रचार पर खर्च करता है।
चुनावी खर्चे पर अंकुश लगाने के लिए ही आज भी फ्रीडम ऑफ वॉल में छात्र संगठन मुद्दों को रखते हुए मतदाताओं से सीधे कैंपेनिंग करते हैं। इसके अलावा जेएनयू में आज भी हैंडमेड पोस्टर का चलन है।
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जेएनयू छात्रसंघ चुनाव देश के किसी के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए मिसाल हैं। चुनावी जंग में कैंपस की दीवारों पर पोस्टर लगाकर गंदा करने के बजाय महज रंगों से मुद्दों को सार्वजनिक मंच पर रखा जाता है।
एआईएसएफ के संयुक्त सचिव पद के प्रत्याशी मुलायम के मुताबिक, चुनाव में छात्रसंघ की कुर्सी तक पहुंचने के मकसद से ही 44 साल पहले जेएनयू छात्रसंघ की फ्रीडम ऑफ वॉल बनाई गई थी, ताकि छात्र मुद्दों को सार्वजनिक रखा जाए और कैंपस की खूबसूरती पर दाग न लगे।
आज उसी सोच के अनुसार जेएनयू के स्कूल ऑफ लैंग्वेज, स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज, स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस और अन्य छोटे स्कूलों की मुख्य दीवार को फ्रीडम ऑफ वॉल के नाम से जाना जाता है, जिस पर छात्र मुद्दे और छात्र संगठनों की सोच को रंगों के माध्यम से दीवार पर उकेरा जाता है।
मोदी, कॉरपोरेट और आम आदमी की रोटी
एआईएसएफ ने स्कूल ऑफ सोशल साइंसेस की फ्रीडम ऑफ वॉल पर मोदी पोस्टर बनाया हुआ है। मोदी के चुनावी भाषणों में युवा, रोजगार और महंगाई पर अंकुश लगाने की बातें हो रही थीं, लेकिन 100 दिन की सरकार के बाद आज आम आदमी रोटी के जुगाड़ में लगा हुआ है।
पोस्टर के माध्यम से मोदी को कॉरपोरेट वर्ल्ड की कुर्सी पर सवार तो आम आदमी की रोटी बुनियादी जरूरतों के जाल में फंसी हुई दिखाई गई है, जिसकी डोर कारपोरेट वर्ल्ड के हाथों में है। वहीं, एनएसयूआई भी लेफ्ट की सोच से बाहर आने का रास्ता दिखा रहा है तो एबीवीपी युवा ताकत को हथियार बनाए बैठी है। एसएफआई खाप के खौफ से युवाओं की आजादी पर कटाक्ष और शिक्षा व संघर्ष की बात कह रही है। वहीं, आइसा लोकतंत्र में आजादी के मायने तलाश रही है।