जिंदगी जीने की चाहत और सोच में खुलापन ने ब्लड कैंसर से पीड़ित युवक को नई जिंदगी दी। इंडीपेंडेंस-2014 की थीम पर बनी डाक्यूमेंट्री में एक बीमार युवक को नए अंदाज और हर पल को जीने की तमन्ना को बेहतरीन रूप में पेश किया गया।
फिल्म के जरिए यह दिखाने की कोशिश की गई कि सोच में खुलापन और आजादी किस तरह इंसान की जिंदगी में बदलाव करता है। इस प्रस्तुति ने पंचकूला सेक्टर-15 के हॉलमार्क स्कूल को दिल्ली शार्ट इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दो सम्मान दिलवाए।
फिल्म ‘ट्रिस्ट विद डेस्टनी’ और नर्सरी राइम्स ने 30 देशों की एंट्रियों के बीच अपनी दावेदारी पेश कर दोनों अवार्ड स्कूल को दिलवाए।
इस फिल्म के निर्माण के लिए 60 घंटे का वक्त मिला, जिसे चंडीगढ़ और पंचकूला में शूट कर पांच मिनट की डॉक्यूमेंट्री बनाई गई, जिसमें भाग लेने वाले सभी एमेच्येार रहे। इस अवार्ड के लिए देश-विदेश की चुनिंदा स्कूलों ने शार्ट फिल्म बनाई थी।
स्कूल के निदेशक जिवतेश गर्ग के अनुसार, इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल-2013 में महज पांच मिनट की शार्ट फिल्म में स्क्रिप्टिंग, कास्टिंग, शूटिंग, कॉस्टयूम, आर्ट डायरेक्शन, म्यूजिक डायरेक्शन, सब टाइटल्स, एडिटिंग, डीवीडी मास्टरिंग आदि को अंजाम देना था। फिल्म को चंडीगढ़ और पंचकूला में शूट किया गया। एडीटिंग चंडीगढ़ स्थित स्टूडियो में की गई थी।
ऐसी थी लघु फिल्म की कहानी
इस फिल्म की कहानी 15 अगस्त 2013 से शुरू होकर 15 अगस्त 2014 में समाप्त होती है। फिल्म का आधार पंडित जवाहर लाल नेहरू की स्पीच ट्रिस्ट विद् डेस्टनी था।
फिल्म में मुख्य किरदार निभा रहे इंजीनियरिंग स्टूडेंट दिव्यांशु मल्होत्रा को डॉक्टर ने ब्लड कैंसर होने की बात कही और एक साल में उसकी जिंदगी खत्म होने का अंदेशा जताया। लेकिन, दिव्यांशु डॉक्टर से इस बात को सुनकर न तो दुखी हुआ और न ही उसके साहस में कमी आई।
वह खुद की सोच में सकारात्मक बदलाव लाने में जुट गया। उसने खुद के विचारों को स्वच्छंद बनाया और सदैव खुश रहने लगा। समय अवधि की समाप्ति पर क्लाईमेक्स तब आता है, जब उसका सपना टूटता है। उसे आभास होता है कि उसकी एक वर्ष की जिंदगी महज एक सपना ही था।
15 अगस्त 2014 को उसे एक नई अनुभूति मिलती है और सकारात्मक सोच के साथ नई जिंदगी को जीने लगता है।