हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के 45वें स्थापना दिवस समारोह पर नौकरशाही और विकास विषय पर करवाई गई गोष्ठी में वक्ता खुलकर बोले। तकरीबन सभी वक्ताओं को मानना था कि नौकरशाहों को अब आत्म चिंतन की जरूरत है।
नागालैंड के पूर्व राज्यपाल और सीबीआई के पूर्व निदेशक डा. अश्वनी कुमार (आईपीएस) बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। वह हिमाचल विवि के छात्र भी रह चुके हैं। मुख्य अतिथि डा. अश्विन कुमार ने कहा कि नौकरशाही को आत्मचिंतन की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि नौकरशाही की मदद से ही सरकारें चलती हैं। आईएमएफ, यूरोपियन यूनियन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं और राष्ट्रीय स्तर पर सीबीआई और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं को नौकरशाह ही सफलतापूर्वक संचालित कर रहे हैं।
नौकरशाही को समाप्त नहीं किया जा सकता है, मगर इसमें सुधार लाने की जरूरत है। पूर्व आईएएस और लेखक श्रीनिवास जोशी ने अनुभवों को साझा करते हुए नौकरशाही और विकास के संबंध को उजागर किया। उन्होंने आजादी के बाद से आज तक नौकरशाही के कार्य करने में आए बदलाव और कार्य में राजनीतिक हस्तक्षेप से पैदा होने वाली समस्याओं को उजागर किया।
'राजनीति ने नौकरशाही के आगे टेके घुटने'
विचार गोष्ठी के पैनल में अमर उजाला के स्थानीय संपादक दयाशंकर शुक्ल ने कहा कि राजनीति ने नौकरशाही के आगे घुटने टेक दिए हैं। पर्दे के पीछे सरकारें नौकरशाह चला रहे हैं। मजे की बात यह कि वह जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं। उनकी बनाई योजनाओं का लाभ गरीब जनता तक नहीं पहुंच रहा।
उन्होंने रोमन दार्शनिक काटो के हवाले से कहा कि नौकरशाह खुद को मिले थोड़े से अधिकार में ही आत्म मुग्ध रहता है, जैसे कोई बच्चा गली के कुत्ते को बांधकर खुश हो जाता है। ऐसे व्यक्तियों पर कौन भरोसा कर सकता है’। कुलपति प्रो. एडीएन वाजपेयी ने कहा कि देश का विकास नौकरशाही पर ही निर्भर करता है, विकास में नौकरशाही आड़े आती है, मगर दूसरी और नौकरशाह ही है जो देश को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है।