बुद्धिजीवी और डीएवी कालेज से बतौर छात्र या शिक्षक पहले जुड़े रहे लोग भले ही मेरिट में दाखिले को छवि में सुधार की बेहतर कवायद मानते हों, लेकिन कालेज के छात्रनेताओं को जैसे इससे कोई वास्ता ही नहीं है।
हो भी क्यों, ऐसा करने से न सिर्फ उनकी राजनीति कमजोर होगी बल्कि वो ताकत भी खत्म हो जाएगी, जिसकी बदौलत बाहरी सियासी चेहरे उन्हें सर आंखों पर रखती है। यही वजह है कि कालेज और छात्रों की बेहतरी से जुड़े मुद्दे पर भी ऐसा सियासी मुलम्मा चढ़ाया जा रहा है कि यह गुम होकर रह जाए। खास बात यह है कि कालेज पर सियासत का यह रंग चढ़ाने में छात्रनेताओं और बाहरी राजनेताओं का ही नहीं, शिक्षकों का भी हाथ है।
राजनीतिक गलियारों में दिखते रहे हैं
कालेज के वर्तमान प्राचार्य डा. देवेंद्र भसीन का जुड़ाव भाजपा से रहा है। कालेज के संस्कृत शिक्षक डा. रामविनय और भूगोल शिक्षक डा. डीके शाही एबीवीपी और डा. आरके पाठक का जुड़ाव समाजवादी पार्टी से है। इसके अलावा भी कई शिक्षक प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से राजनीतिक गलियारों में दिखते रहे हैं।
पूर्व शिक्षक और कर्मचारियों का कहना है कि राज्य गठन के बाद से तो कालेज में बाहरी राजनीति का सीधा दखल लगातार बढ़ता गया। अब आलम यह है कि छात्रसंघ समारोह हो या कालेज का कोई अंदरूनी विवाद स्थानीय विधायक से लेकर मंत्री तक कालेज में चले आते हैं।
नेता और राजनीतिक दल तो छात्रों को वोट बैंक ही मानते हैं, लेकिन छात्रनेताओं को यह नजर नहीं आता। वे तो कालेज के हितों की अनदेखी कर आंखें मूंदे अपने ‘नेताओं’ के पीछे चल पड़ते हैं। इसका ‘फायदा’ भी उन्हें मिलता है। शायद यही वजह है कि कभी जिस कालेज का अध्यक्ष महज 1000 रुपये खर्च कर चुनाव जीत लेता था, वहां अब विधानसभा चुनाव की तर्ज पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है।
इनका कहना है
जिस तरीके से पूरा नेशन अच्छी एजूकेशन की ओर बढ़ रहा है, उसी तरह इन स्टूडेंट लीडर्स को भी ‘पहले आओ, पहले पाओ’ का नारा छोड़ कर मेरिट आधार पर दाखिले को मानना होगा। इससे क्वालिटी और रिजल्ट अच्छा होगा।
-विनीत पुंडीर, डीएवी कालेज
डीएवी के हालात में सुधार के लिए शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों की उच्च स्तरीय समिति का गठन होना चाहिए। समिति को चाहिए कि वह सभी समस्याओं को समझकर प्रदेश की परिस्थितियों के हिसाब से उसका हल निकाले। छात्रसंघ का विलय कर देना चाहिए क्योंकि छात्रनेताओं का कोई विजन नहीं है।
-एक छात्र, सहस्त्रधारा रोड
कालेज में बच्चे का दाखिला कराने का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। बच्चे ने ग्रेजुएशन तो कर लिया अब एमबीए या किसी दूसरे कालेज में दाखिले के लिए माइग्रेशन और चरित्र प्रमाणपत्र के लिए उसे भटकना पड़ रहा है। यह सब गलत है।
-सुशीला नेगी, अभिभावक
कालेज में गढ़वाल विवि के नियम लागू होने चाहिए। अगर प्रत्येक 40 प्रतिशत वाले छात्र को दाखिला मिल जाए तो यहां न तो किसी छात्रनेता की जरूरत पड़ेगी और न ही कभी कोई हंगामा होगा।
-आयुष सेमवाल, पूर्व छात्र नेता
एक साथ इतने छात्रों की संख्या को कम नहीं किया जाना चाहिए। कालेज प्रबंधन को चाहिए कि वह साल दर साल संख्या को घटाए। इससे ऐसे हालात पैदा ही नहीं होंगे।
-प्रभाकर भट्ट, छात्रनेता
मेरिट से ही बनेगी गुणवत्ता
कालेज में अगर मेरिट पर दाखिले होंगे तो ही शिक्षा की गुणवत्ता बनेगी। 40 प्रतिशत वाला छात्र सीधे दाखिला लेकर, सालभर ‘छुट्टी’ काटकर परीक्षा देगा तो वह कैसे कामयाब छात्र बनेगा। हर साल पास होने वाले छात्र डिग्री नहीं कागज का टुकड़ा लेकर जाते हैं। उन्हें न तो रोजगार मिल पाता है और न ही वह किसी बेहतर जगह पर नाम रोशन कर पाते हैं। जरूरी है कि मेरिट को सख्ती से लागू किया जाए।
-डा. महेश भंडारी, पूर्व शिक्षक, डीबीएस कालेज
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