पदक या डिग्री पाने के बाद सीखना बंद नहीं होता, बल्कि जिंदगी का असली सफर शुरू होता है। अब आपकी वास्तविक जिंदगी शुरू हुई है।
संगीत का पथ चुनना है या कोई ओर दिशा पकड़नी है, यह आपके हाथों में है। लविवि के मालवीय सभागार में आयोजित भातखंडे संगीत संस्थान सम विवि के तीसरे दीक्षांत समारोह में यह बातें मुख्य अतिथि बांसुरी वादक पद्मविभूषण पं. हरिप्रसाद चौरसिया ने कहीं।
उन्होंने छात्रों से कहा कि उन्होंने 15 साल की उम्र में पहली बार बांसुरी पकड़ी थी, तभी से सीखना शुरू हुआ और आज भी वह सीख रहे हैं। दो दिवसीय समारोह के पहले दिन सात छात्र-छात्राओं को पीएचडी उपाधि दी गई।
साथ ही मेधावियों को 21 पदक बांटे गए। सबसे ज्यादा तीन स्वर्ण पदक एमपीए के छात्र असर्बअ विश्वास लायल को मिले। समारोह के बाद पंडित जी ने मनमोहक बांसुरी प्रस्तुतियों का मोहपाश बांधा।
मुख्य अतिथि ने कहा कि सीखने के लिए छात्रों को परंपराओं के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। जब मामला सीखने का हो तो पंरपरा का उल्लंघन कोई मायने नहीं रखता।
उन्होंने गुरु के आशीर्वाद के तले हमेशा सीखते रहने की प्रेरणा दी। इससे पहले दीक्षांत समारोह की शुरुआत भातखंडे के छात्र-छात्राओं ने शिक्षकों के साथ वंदेमातरम की प्रस्तुति से की।
भातखंडे कुलगीत नमन शारदे माते सरस्वती तुम वीणा वादिनी.. गया गया। भातखंडे कुलपति प्रो. श्रुति सडोलीकर काटकर ने समारोह की अध्यक्षता कर रहे राज्यपाल बीएल जोशी को स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र भेंट किए।
राज्यपाल ने मुख्य अतिथि को सम्मानित किया। संचालन कर रही भातखंडे की शिक्षिका सृष्टि माथुर ने उपराष्ट्रपति, मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव का बधाई संदेश पढ़कर छात्रों को सुनाया।
कुलपति ने संस्थान की प्रगति रिपोर्ट पढ़ी। इसके बाद मुख्य अतिथि और राज्यपाल ने मेधावी छात्रों को पदक और पीएचडी की उपाधियां दीं।