मसूरी के मानव भारती इंडिया इंटरनेशनल स्कूल में निशांत की मौत एक सबक है। शहर के नामी स्कूलों के हॉस्टलों की चारदीवारी के भीतर कई ‘निशांत’ पल रहे हैं। स्कूल बच्चों के बहकते, मचलते मन नहीं पढ़ पा रहे हैं।
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मां-बांप से मीलों की दूरी, हर गतिविधि पर पहरा और दिल में कोई उलझन पैदा हो तो उसे सुलझाने वाले की गैर-मौजूदगी उनके कदमों को भटका रही है। कई को डिप्रेशन का शिकार बना रही है। मानव भारती इंडिया इंटरनेशनल स्कूल के निशांत के साथ कुछ ऐसा ही हुआ।
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एक छात्रा के प्रति आकर्षण, फिर उसकी कॉपी में कुछ कमेंट्स लिखना, इस पर हॉस्टल वॉर्डन की पिटाई, फिर पिता की डांट का डर...यह सारे दबाव निशांत को दुनिया से दूर ले गए। शहर के स्कूलों में ऐसे ही कई निशांत हैं, जिनके लिए सहानुभूति का हाथ बढ़ाने वाला कोई नहीं, क्योंकि स्कूलों ने गाइडेंस काउंसिलर की व्यवस्था ही नहीं की है।
शहर के टाप स्कूलों तक में यह हालात हैं। वहां करियर से जुड़ी परेशानी हल करने को काउंसलर तो रख दिए गए, लेकिन मन की गांठ खोलने वाला कोई नहीं।
शहर के प्रतिष्ठित स्कूलों पर एक नजर
दून स्कूल
दून स्कूल में करियर काउंसलर की व्यवस्था की गई है, वह इसलिए ताकि बच्चों को करियर, पढ़ाई, कोर्स से जुड़ी कोई समस्या हो तो तत्काल समाधान हो सके, लेकिन अगर वह डिप्रेशन महसूस करता है या मन से जुड़ी किसी उलझन में फंस गया है तो कोई इलाज नहीं। स्कूल के पीयूष मालवीय कहते हैं कि छात्रों को ऐसी कोई दिक्कत होती ही नहीं।
वेल्हम गर्ल्स
यहां भी करियर काउंसिलर की मौजूदगी है। लेकिन क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट यहां नहीं। यहां के शिक्षक मनोज शर्मा अलबत्ता दावा करते हैं कि स्कूल में किसी तरह की समस्या छात्राओं को नहीं होती, क्योंकि जब भी जरूरत पड़ती हैतो साइकोलॉजिस्ट को स्कूल में आमंत्रित किया जाता है।
दून इंटरनेशनल स्कूल
दून इंटरनेशनल स्कूल में फिलहाल काउंसिलर ही नहीं। यहां के उप-प्रधानाचार्य दिनेश बड़थ्वाल दावा करते हैं कि काउंसिलर ने पिछले माह ही यहां से छोड़ा है। नए सिरे से काउंसिलर की नियुक्ति होनी है। उसके लिए इंटरव्यू चल रहे हैं।
बच्चों की छोटी बातें समझें
गाइडेंस काउंसिलर हर स्कूल के लिए जरूरी है। ऐसी कई छोटी-छोटी बातें होती हैं, जिन्हें माता-पिता, शिक्षक बहुत भाव नहीं देते, लेकिन बच्चों के मासूम मन के लिए यह बातें बहुत मायने रखती हैं। मसूरी की घटना को देखते हुए वह बच्चों के लिए साइकोलॉजिकल गाइडेंस को बेहद आवश्यक करार देती हैं।
- डा. प्रतिमा, गाइडेंस काउंसिलर, सेंट जोजफ्स एकेडमी
मां-बाप समझते नहीं
बच्चे टीचर से अपनी बात नहीं कह पाते, क्योंकि वह जजमेंटल होते हैं। मां-बाप उन्हें समझते नहीं, ऐसे में काउंसिलर से अपनी उलझन वह आसानी से कह सकते हैं। उनके मुताबिक बढ़ती उम्र में बच्चों को शारीरिक, मानसिक कई दिक्कतों से गुजरना पड़ता है। अच्छी गाइडेंस न मिलने से वह भटक जाते हैं। लिहाजा, हर स्कूल में गाइडेंस काउंसिलर जरूरी है।
-राधिका गुप्ता, गाइडेंस काउंसिलर, स्कालर्स होम
मसूरी में भी कुछ ऐसा ही
मसूरी का हाल भी कुछ ऐसा ही है। मानव भारती इंडिया इंटरनेशनल स्कूल, मसूरी पब्लिक स्कूल, सेंट जॉर्जेज कॉलेज जैसे नामी स्कूलों तक में गाइडेंस काउंसिलर के रूप में नियुक्ति नहीं। मसूरी अपने बोर्डिंग स्कूलों के लिए मशहूर है। लेकिन ज्यादातर कमाई के पर्याय बने हुए हैं।
छात्रों की देखभाल के लिए उचित और प्रशिक्षित स्टाफ तक की कमी है। ऐसे में किसी तरह की काउंसिलिंग न होने का खामियाजा बच्चों में डिप्रेशन और कभी-कभी उनकी जान देने की घटना के रूप में सामने आता है।
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बोर्डिंग स्कूल हो या को-एड, बदलती उम्र में विपरीत आकर्षण के चलते कई बार छात्र डिप्रेशन में चले जाते हैं। जान तक देने से नहीं चूकते। ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए स्कूलों में सेक्स एजुकेशन और कांउसलिंग बेहद जरूरी है। खासकर को-एड स्कूलों में इसकी अलग से क्लासेज लगनी चाहिए।
- अताउर रब सिद्धीकी, अधिवक्ता, मसूरी
सीबीएसई ने तो गाइड लाइन दी, पर....
सीबीएसई ने तो बच्चों पर से तनाव, दबाव हटाने के लिए स्कूलों में गाइडेंस काउंसिलरों की नियुक्ति की बात कही है, लेकिन बाकी बोर्ड में इसे मेनडेटरी नहीं किया गया है। दून में ज्यादातर स्कूल आईसीएसई/आईएससी हैं। इसी का फायदा उठाते हुए वह गाइडेंस काउंसिलरों की नियुक्ति से आंखें चुराए हुए हैं।
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