प्रदेश के अलग-अलग जिलों में ऐसे दर्जनों आईटीआई (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान) हैं जिनके दाखिलों की सूचना व्यावसायिक परीक्षा परिषद को नहीं थी।
इन संस्थानों से हजारों अभ्यर्थी जुलाई 2013 की परीक्षा में शामिल हुए हैं। फर्जीवाड़े की बात डीजीईटी (डायरेक्टोरेट जनरल ट्रेनिंग एंड एम्प्लॉयमेंट) तक पहुंची तो इसकी जांच शुरू हो गई।
प्रशिक्षित कामगार बनाने के लिए भारत सरकार के अधीन डीजीईटी द्वारा संचालित कोर्सेज के जरिए युवाओं को औद्योगिक प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रदेश में इस समय 275 सरकारी और 1400 से ज्यादा निजी आईटीआई हैं।
सरकारी आईटीआई में करीब 50 हजार और निजी आईटीआई में करीब पौने दो लाख सीटें हैं। आईटीआई में दाखिले के लिए हर वर्ष करीब छह लाख अभ्यर्थी प्रवेश परीक्षा देते हैं।
कम फीस और प्रशिक्षण की अच्छी गुणवत्ता के कारण राजकीय संस्थान अभ्यर्थियों की पहली पसंद होते हैं। निजी संस्थानों में दाखिला लेने में अभ्यर्थी कम दिलचस्पी दिखाते हैं।
पहले भी निजी संस्थानों द्वारा फर्जी परीक्षार्थियों को परीक्षा दिलाने की शिकायतें मिलती रही हैं, इसलिए वर्ष 2011 से सभी संस्थानों को उनके यहां दाखिला लेने वाले छात्रों का रजिस्ट्रेशन प्रशिक्षण एवं सेवायोजन निदेशालय की वेबसाइट पर करना अनिवार्य था।
संस्थानों ने भरवाए फर्जी फॉर्म
जुलाई 2013 की परीक्षा के लिए 31 मार्च 2012 रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख निर्धारित की गई। इस तरह व्यावसायिक परीक्षा परिषद को संस्थानों में दाखिल स्टूडेंट्स का ब्यौरा मिल जाता।
इसके बावजूद प्रदेश के दर्जनों ऐसे संस्थान थे जिन्होंने एक भी छात्र का रजिस्ट्रेशन नहीं किया। जुलाई 2013 की परीक्षा से ठीक पहले जून के महीने में ओएमआर शीट के माध्यम से परीक्षा फॉर्म भरवाए गए और संस्थानों ने दर्जनों फर्जी छात्रों के फॉर्म भरवा दिए।
बिना प्रवेश-पत्र के हुई थी परीक्षाजुलाई 2013 में हुई आईटीआई की परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों की वास्तविक संख्या की जानकारी व्यावसायिक परीक्षा परिषद को नहीं थी।
यही वजह थी कि जुलाई 2013 की परीक्षा देने वाले सभी अभ्यर्थियों को परिषद प्रवेश-पत्र तक नहीं दे सकी। लखनऊ समेत पूरे प्रदेश के अभ्यर्थियों ने बिना प्रवेश-पत्र परीक्षा दी थी।