कर्ज अदा न किए जाने पर कर्जदार के साथ-साथ लोन के गारंटर को भी इरादतन (विलफुल) डिफाल्टर घोषित करने के भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के फैसले पर उद्योग जगत से तीखी प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।
उद्योग संगठन एसोचैम ने कहा है कि पहले कर्ज लेने वाले से रिकवरी के सभी उपाय किए बिना बैंकों से लोन के गारंटर को विलफुल डिफाल्टर घोषित करने को कहना आरबीआई की एक कमर तोड़ने वाली प्रतिक्रिया है। यह गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) पर लगाम लगाने का सही तरीका नहीं है। आरबीआई के इस कदम से लोन के लिए गारंटर मिलना मुश्किल हो जाएगा, जोकि लोन के कारोबार को काफी बुरी तरह प्रभावित करेगा।
एसोचैम के महासचिव डीएस रावत ने कहा कि कर्जदार से लोन की रिकवरी के संभव उपाय नाकाम हो जाने पर गारंटर की ओर रुख करने का औचित्य तो समझ में आता है, पर ऐसा किए बिना सीधे गारंटर पर टूट पड़ना एक गलत प्रचलन होगा। यह कर्जदार के बजाय लोन गारंटरों की नींद उड़ाएगा। रावत के मुताबिक ऐसा करके बैंक लोन लेने वाले की क्षमता का आकलन करने और मामले को देखने-संभालने की अपनी जिम्मेदारी को गारंटर के सिर पर डालने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पूंजी का ठीक से प्रबंधन न करने के चलते लोन न चुका पाने वाले कर्जदार को गारंटर पर अपने कर्ज की गठरी लाद कर बच निकलने का रास्ता मिल जाएगा।
रावत ने कहा कि हालांकि आरबीआई के सर्कुलर कहा गया है कि कर्ज न चुकाने के मामले में कर्जदार के साथ ही गारंटर को ‘भी’ विलफुल डिफाल्टर मानते हुए कार्रवाई की जाए। ऐसी छूट देना वास्तव में कर्जदार से निपटे बिना सीधे गारंटर के खिलाफ कार्रवाई करने को बढ़ावा देने वाली साबित होगी। इससे सबसे पहले गारंटर पर विलफुल डिफॉल्टर बन जाएगा, क्योंकि पहले कर्जदाता के साथ मामले के निपटारे के सारे प्रयास करने पर बैंकों का जोर नहीं होगा।