बुधवार को भारतीय रिजर्व बैंक के वर्ष 2005 से पहले के करेंसी नोटों को बंद करने के फैसले को काले धन, राजनीति और चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, रिजर्व बैंक के गवर्नर की सफाई है कि इस कदम का चुनाव, राजनीति या काले धन से कोई मतलब नहीं है।
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इसके जरिए हमारी कोशिश बेहतर सुरक्षा फीचर वाले नोटों को चलन में रखना है। लेकिन लोग कयास लगा रहे हैं इस कदम से काला धन बाहर आएगा।
रीयल एस्टेट और सोने के दाम बढ़ जाएंगे क्योंकि लोग इन दोनों में काले धन का निवेश कर सकते हैं। लेकिन अगर तथ्यों पर नजर डालें तो दूसरी ही तस्वीर सामने आती है जिससे लगता है कि यह फैसला काले धन को बाहर लाने में कोई बड़ा कदम साबित होने वाला नहीं है।
हकीकत जानिए, भ्रम मत पालिए
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक 500 और 1,000 रुपये के नोट की हिस्सेदारी लेनदेन के लिए उपयोग हो रही करेंसी में 2005 के पहले की तुलना में बहुत ज्यादा तेजी से बढ़ी है।
वहीं 2005 के पहले यह हिस्सेदारी मात्र 54 फीसदी थी जो मार्च, 2013 के अंत में बढ़कर करीब 83 फीसदी तक पहुंच गई।
रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक मार्च, 2005 के अंत में देश में चलन में करेंसी का कुल वैल्यू 3,61,229 करोड़ रुपये था। इसमें 500 रुपये और 1,000 रुपये के नोटों की हिस्सेदारी का वैल्यू 1,94,810 करोड़ रुपये था यानी कुल चलन वाले करेंसी नोटों का 54 फीसदी।
कितने रुपए चल रहे हैं मार्केट में?
लेकिन इसके बाद की तसवीर देखिये। रिजर्व बैंक के मुताबिक मार्च, 2013 के अंत में 11,64,800 करोड़ रुपये मूल्य के करेंसी नोट चलन में थे। इसमें 500 रुपये वाले नोटों का वैल्यू 5,35,900 करोड़ रुपये और 1,000 रुपये वाले नोटों का वैल्यू 4,29,900 करोड़ रुपये था।
यानी कुल 9,65,800 करोड़ मूल्य के यह दो बड़े आकार वाले नोट थे बाकी हिस्से में इनसे नीचे के आकार वाले सभी नोट शामिल हैं। इस तरह से कुल नोटों में करीब 83 फीसदी हिस्सेदारी 500 और 1,000 रुपये वाले नोटों की है।
इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर काला धन नोटों के रूप में लोगों ने ज्यादा रखा है तो उसका आकार वर्ष 2005 से अभी तक ज्यादा तेजी से बढ़ा होगा।
क्या सच में काला काला धन आएगा बाहर?
जहां तक 2005 से पहले के नोटों की बात है तो उनका एक बड़ा हिस्सा ऐसे नोटों का भी होगा जो उपयोग के योग्य न रहने के चलते पहले ही बैंकों में जमा होकर बदले जा चुके होंगे।
दूसरे सामान्य कामकाज के लिए लोगों द्वारा इस्तेमाल किये जा रहे इन नोटों की संख्या भी काफी बड़ी मानी जा रही है।
वहीं इस तर्क को भी नकारा नहीं जा सकता है कि अगर काला धन रीयल एस्टेट और सोना के रूप में रखा जाता है तो उसकी वैल्यू में इजाफा होता रहता है।
लेकिन इसके उलट करेंसी नोट के रूप में काला धन रखने का मतलब है कि महंगाई के चलते इसकी वास्तविक वैल्यू का घटते जाना है। ऐसे में कोई नौ साल तक काले धन के रूप में नोटों को शायद ही कोई रखे।
बहरहाल यह आने वाले कुछ महीनों में साफ होने लगेगा कि वाकई लोगों ने नोटों के रूप में कितना काला धन छिपा रखा है।
हालांकि अब रिजर्व बैंक भी सफाई दे रहा है कि नोटों को बदलने के पीछे बड़ा कारण नकली करेंसी को चलन से हटाना और लोगों को बेहतर सुरक्षा फीचर वाले नोट उपलब्ध कराना है।
इसके लिए गवर्नर ने लेस एफिशिएंट नोटों को बेटर एफिशिएंट नोटों से बदलना का जुमला दिया है।