फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मोदी बजट के लिए 'विलेन' बनेगी मौसम की बेरुखी

विज्ञापन
विज्ञापन
इस साल मानसून सूखा रहने का खतरा बढ़ता जा रहा है। पिछले हफ्ते मानसून काफी कमजोर रहा, जिसके चलते उत्तरी राज्यों में अच्छी बारिश के लिए जुलाई तक इंतजार करना पड़ सकता है। इस सीजन में अभी तक औसत से 37 फीसदी कम बारिश हुई है।
विज्ञापन


मौसम की बेरुखी मोदी सरकार के पहले बजट को सूखा केंद्रित बनाने पर मजबूर कर सकती है। एक तरफ कृषि उत्पादन घटने से महंगाई की आग भड़कने का खतरा है तो दूसरी ओर सूखे जैसे हालात ग्रामीण मांग को झटका दे सकते हैं।

सब्जियों के दामों में लगेगी आग

मौसम विभाग के अनुसार, अगले 3-4 दिन भी मानसून कमजोर रहने की आशंका है। लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में अच्छी बारिश हो सकती है।

बारिश में कमी की मार धान, दलहन, तिलहन, मोटे अनाजों के अलावा फल-सब्जियों के उत्पादन पर भी पड़ेगी। एक जून से अब तक दिल्ली की थोक मंडियों में प्याज के दाम 1,105 रुपये से बढ़कर 1,300 रुपये प्रति क्विंटल और आलू 1,478 रुपये से बढ़कर 1,750 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुके हैं।

मोदी जी कुछ तो उपाय कीजिए

कमजोर मानसून का सबसे ज्यादा असर मध्य भारत में है, जहां औसत से 51 फीसदी कम बारिश हुई है। दलहन और तिलहन उत्पादन में अग्रणी मध्य भारत की अधिकांश खेती वर्षा आधारित है।

एचएसबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बारिश में 10 फीसदी कमी आने पर खाने-पीने की चीजों की महंगाई 2.8 फीसदी और खुदरा महंगाई 1.3 फीसदी तक बढ़ सकती है। इसे देखते हुए आगामी 10 जुलाई को पेश होने वाले आम बजट में सूखे और महंगाई से निपटने के लिए खास उपाय करने पड़ेंगे।

ऐसे में ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदों पर भी पानी फिर सकता है। क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी का कहना है कि अगर मानसून में सुधार नहीं आया तो बजट में सूखे से निपटने के उपायों पर सरकार को खर्च बढ़ाना पड़ेगा।
विज्ञापन

'सूखा मानना अभी जल्दबाजी '

कृषि आयुक्त जेएस संधू का कहना है कि खेती पर मानसून के असर के लिए 15 जुलाई तक इंतजार करना चाहिए। अभी सूखे जैसे हालात कहना जल्दबाजी होगा। कई बार ऐसा हुआ है कि जून में कम बारिश के बाद जुलाई में अच्छी बारिश हुई।

हालांकि आंकड़े कह रहे हैं कि बारिश में कमी के चलते खरीफ की बुवाई जोर नहीं पकड़ पाई है। गत 21 जून तक 95 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में खरीफ की बुवाई हुई जो पिछले साल से करीब 14 लाख हेक्टेअर कम है।

धान की बुवाई सिर्फ 7.59 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में हुई है जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 16.4 लाख हेक्टेअर तक पहुंच गया था। दलहन की बुवाई 2.60 लाख और तिलहन की बुवाई 1.23 लाख हेक्टेअर क्षेत्र में हुई है, जो गत वर्ष से काफी कम है।

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें