कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट जारी है। कच्चे तेल की वेस्ट टेक्सेस इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) वैरायटी की कीमत 50 डॉलर से भी कम हो गई है, वहीं दूसरी ओर ब्रेंट वैरायटी के कच्चे तेल की कीमत भी 51 डॉलर पर आ गई है।
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आपको बता दें कि जून 2014 में ब्रेंट वैरायटी के कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर थी, जिसमें पिछले सिर्फ 7 महीनों में ही 55% की तेज गिरावट देखने को मिली है।
7 जनवरी 2014 को डब्ल्यूटीआई वैरायटी के कच्चे तेल की कीमत करीब 92 डॉलर प्रति बैरल थी और ब्रेंट वैरायटी की कीमत करीब 108 डॉलर प्रति बैरल थी। 7 जनवरी 2015 तक यह कीमतें गिरकर 50 डॉलर प्रति बैरल के करीब आ गई हैं।
रुपए के संदर्भ में कच्चे तेल की कीमत 12 जनवरी को घटकर 2850.66 रुपए प्रति बैरल हो गई, जबकि 9 जनवरी को 2955.26 रुपये प्रति बैरल थी।
आए दिन कच्चे तेल में हो रही इस गिरावट से हर किसी के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर यह गिरावट आ क्यों रही है। इस गिरावट का सबसे बड़ा कारण अमेरिका, रूस और ओपेक देश हैं।
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अमेरिका में कच्चे तेल का उत्पादन
कच्चे तेल की गिरती कीमतों के लिए शेख और शेल ही जिम्मेदार हैं। यहां शेख से मतलब ओपेक देशों से है और शेल से मतलब अमेरिका से है, जहां पर शेल की खोज हुई है। माना जा रहा है कि जब तक शेख और शेल की लड़ाई चलेगी, तब तक ये कीमतें गिरती ही रहेंगी।
कभी कच्चे तेल का आयात करने वाला अमेरिका अब निर्यात करने लगा है। इसने भी कच्चे तेल की कीमतों को काफी कम कर दिया है। कुछ समय पहले अमेरिका करीब 3 मिलियन बैरल कच्चे तेल का रोजाना आयात करता था, लेकिन अब अमेरिका निर्यात की मुद्रा में आ गया है।
माना जा रहा है कि 2015 के अंत तक अमेरिका रोजाना 1 मिलियन बैरल कच्चे तेल का निर्यात करने लगेगा। 2009 में अमेरिका में कच्चे तेल का उत्पादन 5.35 मिलियन बैरल प्रतिदिन था, जो पिछले 6 सालों में 2014 तक बढ़कर 9.05 मिलियन डॉलर प्रतिदिन हो गया है।
रूस भी है एक वजह
रूस दुनिया में सबसे अधिक कच्चे तेल का उत्पादन करने वाला देश है। रूस की इकोनॉमी का 70 फीसदी हिस्सा कच्चे तेल से ही आता है। कच्चे तेल की गिरती कीमतों की वजह से रूस की करंसी रूबल भी आए दिन गिरती जा रही है, जिससे इकोनॉमी को बहुत नुकसान हो रहा है।
रूस के वित्त मंत्री एंटन सिलोनोव ने बुधवार को ही कहा है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों का औसत 50 डॉलर प्रति बैरल रहा तो अगले साल के बजट में रूस को 3 खरब रूबल (करीब 45.6 अरब डॉलर) का नुकसान होगा।
ऐसे में अपनी इकोनॉमी को वित्तीय संकट से बचाने के लिए रूस अधिक तेल का उत्पादन कर रहा है, जो बाजार में कच्चे तेल की मात्रा को और अधिक बढ़ा रहा है। इसके कारण से भी कच्चे तेल की कीमत में और अधिक गिरावट देखने को मिल रही है।
ओपेक देश भी हैं कारण
ओपेक देशों पर कच्चे तेल के उत्पादन को लेकर कोई भी प्रतिबंध नहीं है। वह जितना चाहें उतना कच्चा तेल निकाल सकते हैं। हाल ही में एक मीटिंग में ओपेक देशों से कच्चे तेल के उत्पादन पर सीमा तय करने की बात भी कही गई थी, लेकिन ओपेक देशों ने ऐसा करने से मना कर दिया।
आपको बता दें कि इस समय बाजार में पहले ही कच्चे तेल की अधिकता हो गई है और ऐसे में अगर ओपेक देश कच्चे तेल के उत्पादन पर कोई नियंत्रण नहीं करते हैं तो इससे कच्चे तेल की कीमत और अधिक गिरने के आसार हैं।
ओपेक देशों और रूस के अधिक कच्चा तेल उत्पादन करने की वजह से भले ही इसकी कीमत में और गिरावट आए, लेकिन इन देशों के पास कच्चा तेल ही कमाई का प्रमुख रास्ता है।
ऐसे में तेल की कीमतें गिरने से पहले ही उन्हें नुकसान का सामना करना पड़ रहा है और अगर अब वो इसके उत्पादन को कम करते हैं तो इससे उन्हें और अधिक नुकसान होगा।
अपने नुकसान को पूरा करने के लिए इन देशों को और अधिक कच्चे तेल का उत्पादन करना होगा, ताकि अपने नुकसान की भरपाई कर सकें। हालांकि, इसकी वजह से कीमतें और अधिक गिर सकती हैं।