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रोमिंग के बहाने उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ा रहीं कंपनियां

Sat, 02 Feb 2013 11:32 PM IST
नई दिल्ली/धीरज कनोजिया
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मोबाइल सेवा देने वाली कंपनियां ग्राहकों पर रोमिंग शुल्क का बोझ मनमाने तरीके से डाल रही हैं। यहां तक कि मुफ्त रोमिंग सेवा का विरोध भी अपने नाजायज मुनाफे को बचाने की कंपनियों की रणनीति का हिस्सा है। दरअसल, ज्यादातर मोबाइल सेवा कंपनियों को अखिल भारतीय स्तर पर लाइसेंस हासिल है। ऐसी सूरत में ग्राहकों से रोमिंग शुल्क लेना बिल्कुल गलत है, क्योंकि कंपनियों को देशभर में अपने नेटवर्क पर ग्राहकों को फोन सेवा देने में मुश्किल से ही कुछ अतिरिक्त खर्च करना होता है।
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भारती एयरटेल, वोडाफोन, रिलायंस कम्युनिकेशन, टाटा टेलीसर्विसेज और बीएसएनएल जैसी सभी बड़ी मोबाइल सेवा कंपनियों के पास अखिल भारतीय स्तर पर लाइसेंस है। ऐसे में ग्राहकों को रोमिंग सेवा देने में कंपनियों को मुश्किल से ही कुछ ज्यादा खर्च करना पड़ता है।

मगर कंपनियां लंबे समय से ग्राहकों से भारी रोमिंग शुल्क वसूल रही हैं। वे अभी इनकमिंग कॉल के लिए एक रुपये प्रति मिनट और आउटगोइंग कॉल के लिए डेढ़ रुपये प्रति मिनट वसूल रही हैं। सरकार भी अब जाकर नींद से जागी है और फ्री रोमिंग की बात कर रही है।
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कंपनियां सरकार के इस पहल का खुलकर विरोध कर रही हैं। वे सरकार को कॉल दर बढ़ाने की धमकी दे रही हैं। यही नहीं कंपनियां रोमिंग सेवा बंद करने का भी डर दिखा रही हैं। कंपनियों का यह विरोध दरअसल, उस दस हजार करोड़ रुपये की कमाई को बचाने की जद्दोजहद है, जो वह ग्राहकों से रोमिंग शुल्क के रूप में कमाती हैं। इंडस्ट्री सूत्रों के मुताबिक कंपनियों को रोमिंग शुल्क के जरिए दस हजार करोड़ से ज्यादा का मुनाफा होता है।

क्या कहत हैं विशेषज्ञ
टेलीकॉम विशेषज्ञ महेश उप्पल कहते हैं कि यह सही है कि रोमिंग शुल्क के नाम पर ग्राहकों को ज्यादा पैसे देने पड़ रहे हैं। रोमिंग शुल्क पर लगाम लगाना गलत नहीं है। अन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि पैन इंडिया लाइसेंस की स्थिति में रोमिंग शुल्क लेना न्यायसंगत नहीं है। उनका कहना है कि जब कंपनियों के पास अखिल भारतीय स्तर पर लाइसेंस नहीं था, तब रोमिंग शुल्क लेना जायज समझा जाता था। मगर पैन इंडिया लाइसेंस हासिल करने के बाद भी कंपनियां ग्राहकों पर रोमिंग का बोझ डाल रही हैं।
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