छोटे और मझोले कारोबारियों के लिए अपने वेंडर से भुगतान में होने वाली देरी अब कार्यशील पूंजी की कमी की वजह नहीं बनेगी। सरकार भुगतान की किल्लत दूर करने के लिए फैक्टरिंग सेवाओं के जरिए लिए गए कर्ज पर अब गारंटी देगी। इसके लिए 500 करोड़ रुपये का क्रेडिट गारंटी फंड बनाया जाएगा। जिसकी देखरेख की जिम्मेदारी नाबार्ड के पास होगी।
क्या है फैक्टरिंग सेवाएं
छोटे और मझोले कारोबारी ज्यादातर बड़ी कंपनियों के लिए वेंडर के रूप में काम करते हैं। इसके तहत, कंपनियां आर्डर मिलने के बाद भुगतान तुरंत नहीं करती हैं। बल्कि , उन्हें यह भुगतान दो से तीन महीने के अंदर मिलता है। इस अवधि में भुगतान न मिलने से छोटे कारोबारी कार्यशील पूंजी की कमी का सामना करते हैं। उनकी इस समस्या को दूर करने के लिए बैंक या फैंकटरिंग सेवाएं देने वाली कंपनियां छोटे कारोबारी को उनके आर्डर की राशि का एक निश्चित हिस्सा ब्याज के रूप में लेकर भुगतान करती हैं। ऐसा होने से छोटे कारोबारी को पूंजी तुरंत मिल जाती है, जिसे वह अपने कारोबार में इस्तेमाल कर सकता है।
क्या होंगे नए प्रावधान
फैक्टरिंग सर्विसेज कानून लागू होने के बाद भी अभी बहुत कम कंपनियां और बैंक हैं, जो फैक्टरिंग सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में इस सेवा को लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार ने नए वित्त वर्ष में 500 करोड़ रुपये का क्रेडिट गारंटी फंड बनाने का प्रावधान किया है। इसके तहत कर्ज देने वाले वित्तीय संस्थानों को उनके द्वारा दिए गए कर्ज पर 80-90 फीसदी तक की गारंटी एक निश्चित राशि पर मिलेगी। नए क्रेडिट गारंटी फंड की देख-रेख नाबार्ड करेगा।
क्यों हैं जरूरत
छोटे और मझोले कारोबारियों को एमएसएमईडी एक्ट-2006 के मुताबिक अपने आर्डर का भुगतान अधिकतम 45 दिन में मिल जाना चाहिए। इसके बावजूद कारोबारियों को तय समय में भुगतान नहीं मिलता है। आर्थिक सुस्ती के दौर में तो भुगतान अवधि और बढ़ जाती है। मौजूदा समय में यह अवधि 100 दिन के करीब तक पहुंच गई है। भुगतान में देरी की प्रमुख वजह कारोबार का मंदा होना है। ऐसे में फैक्टरिंग सेवाओं के जरिए छोटे कारोबारी के लिए कार्यशील पूंजी की किल्लत नहीं आती है।