वालमार्ट ,कारफूर जैसी विदेशी कंपनियों को भारत में मल्टी ब्रांड रिटेल में कारोबार करने पर थोड़ी राहत मिल सकती है। कंपनियों को छोटे कारोबारियों से की जाने वाली अनिवार्य खरीदारी के नियम में छूट मिल सकती है।
हालांकि यह छूट शर्तों के आधार पर शुरू में दो से तीन साल तक ही देने की तैयारी है। उसके बाद कंपनियों को छोटे कारोबारियों से 30 फीसदी खरीदारी करना अनिवार्य होगा।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इस डर को कि छोटे कारोबारी गुणवत्ता वाले उत्पाद नहीं बना पाएंगे, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग मंत्रालय ने एक रोडमैप तैयार किया है। इसके जरिए विदेशी कंपनियों को एसएमई से 30 फीसदी खरीदारी करना आसान हो सकेगा।
मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि हम मल्टी ब्रांड रिटेल में छोटे कारोबारियों से 30 फीसदी खरीदारी के पक्ष में हैं। अधिकारी के अनुसार कंपनियां 30 फीसदी खरीदारी की अनिवार्यता को खत्म कराना चाहती हैं।
उनका डर है कि देश के छोटे कारोबारी उनकी जरूरत के मुताबिक गुणवत्ता वाले उत्पाद नहीं दे पाएंगे। ऐसे में हमारी राय है कि शुरू में सरकारी खरीद नीति की तरह कंपनियों के लिए दो से तीन साल तक खरीदारी की अनिवार्यता को न रखकर कारोबार शुरू किए जाने को तरजीह दी जानी चाहिए। देश में कंपनियों के लिए वेंडर तैयार हो जाने के बाद अनिवार्यता की शर्त लागू होनी चाहिए।
इस अवधि के लिए मंत्रालय अपनी पांच प्रमुख स्कीम को वेंडर विकसित करने के लिए जोड़ने की बात कह रहा है। मंत्रालय की लीन मैन्यूफैक्चरिंग, क्वॉलिटी मैनेजमेंट, डिजाइन क्लीनिक, आईपीआर और बारकोड की स्कीम से शुरुआत के दो से तीन साल में छोटे कारोबारियों को विदेशी कंपनियों के वेंडर के रुप में विकसित किया जा सकता है।
इसके पहले विदेशी कंपनियों को सिंगल ब्रांड रिटेल में 30 फीसदी एसएमई से खरीदारी की अनिवार्यता को खत्म किया गया था। इसे देखते हुए कंपनियां अब मल्टी ब्रांड रिटेल में भी इसी तरह की छूट चाहती हैं। इस संबंध में वाणिज्य मंत्रालय ने संबंधित मंत्रालयों से अपनी राय देने को कहा है।
विदेशी कंपनियों की बेरुखी को देखते हुए वाणिज्य मंत्रालय की कवायद है कि नियमों को आसान कर विदेशी निवेश बढ़ाया जाए। मल्टी ब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई सीमा करने के बाद भी उम्मीद के मुताबिक निवेश नहीं आ पाया है। ऐसे में वाणिज्य मंत्रालय नए प्रस्तावों के साथ कैबिनेट नोट बनाने की तैयारी में है।