अपने आदेशों को कानूनी चुनौती दिए जाने के बढ़ते मामलों को देखते हुए बाजार नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) डिफॉल्टरों से कानूनी खर्चों की रिकवरी की तैयारी में है। साथ ही सेबी कंपनियों को दी जाने वाली सेवाओं के लिए शुल्क वसूलने पर भी विचार कर रहा है।
सेबी यह कवायद हाल के वर्षों में इस तरह के मामलों में होने वाले खर्च में हुई बढ़ोतरी को देखते हुए करना चाहता है। आदेशों को अपीलीय प्राधिकार, ट्रिब्यूनल व कोर्ट में कानूनी चुनौती दिए जाने के चलते सेबी को पिछले तीन वित्त वर्षों के दौरान चार से पांच करोड़ रुपये खर्च करने पड़े हैं। चालू वित्त वर्ष में यह कानूनी खर्च और भी बढ़ने के आसार हैं।
ऐसे में सेबी चाहता है कि उसके द्वारा डिफॉल्टर कंपनियों पर पेनल्टी लगाए जाने के मामलों में वह दंड की रकम सरकारी खजाने में जमा करने से पहले ही उसकी रिकवरी डिफॉल्टर से कर ले। इसके अलावा खर्चों के बढ़ते भार को देखते हुए सेबी कंपनियों को दी जाने वाली विभिन्न प्रकार की सेवाओं पर प्रोसेसिंग फीस वसूल करने का विकल्प अपनाने के बारे में भी सोच रहा है।
फिलहाल सेबी कंपनियों, स्टॉक एक्सचेंजों और डिपॉजिटरीज आदि को इस तरह की सेवाएं निशुल्क देता है। सूत्रों के अनुसार इन सेवाओं पर आने वाले खर्च को देखते हुए सेबी अब इसके लिए शुल्क वसूलने के बारे में सोच रहा है। इसके साथ ही सेबी इनफार्मेशन गाइडेंस और कंसेंट सेटलमेंट के जरिए मामलों का निपटारा करवाने हेतु लिए जाने वाले शुल्क में भी बढ़ोतरी कर सकता है।
सभी प्रस्तावों पर सेबी के बोर्ड की इसी सप्ताह होने वाली बैठक में विचार किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक यह सुझाव सेबी की वित्तीय संसाधनों से संबंधित कमेटी (सीआरएफआर) की ओर से दिए गए हैं, जिनपर आगामी बैठक में विचार किया जा सकता है।