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तेल ने बिगाड़ा रुपये का खेल

Mon, 15 Dec 2014 09:13 AM IST
नई दिल्ली/ राजीव कुमार
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नई सरकार की तरफ से आर्थिक सुधार कार्यक्रम के दावों के बावजूद पिछले दस दिनों से डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट हो रही है। डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य 10 माह के न्यूनतम स्तर पर चला गया है। गत शुक्रवार को रुपये के मूल्य में डॉलर के मुकाबले 31 पैसे की गिरावट आई और एक डॉलर का मूल्य 62.33 रुपये हो गया। अर्थशास्त्री व बाजार विशेषज्ञ रुपये में हो रही गिरावट के लिए मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कारणों को तो कुछ हद तक घरेलू स्तर पर औद्योगिक सुधार की धीमी गति को जिम्मेदार बता रहे हैं।
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क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री डीके जोशी के मुताबिक डॉलर के मुकाबले रुपये में हो रही गिरावट के लिए पूंजी के बाहर जाने के साथ जापान व यूरोप की अर्थव्यवस्था में आने वाली सुस्ती भी जिम्मेदार है। उनका कहना है कि अभी कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट चल रही है। इस वजह से तेल की खरीदारी ज्यादा हो रही है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। इसका असर भी रुपये के मूल्य पर पड़ा है।

इकरियर के सलाहकार अभीक बरुआ के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय कारण काफी हद तक तो घरेलू स्तर पर औद्योगिक क्षेत्र में होने वाले सुधार की धीमी गति भी कुछ हद तक रुपये में हो रही गिरावट के लिए जिम्मेदार है। अभी डॉलर में मजबूती का दौर चल रहा है और डॉलर कई करेंसी के मुकाबले मजबूत हुआ है। इस वजह से भी रुपये के मूल्य में गिरावट आई है। वहीं, कच्चे तेल के भाव गिरने से तेल कारोबार करने वाले देश अपने सॉवरेन वेल्थ फंड से किए गए निवेश को वापस निकाल रहे हैं और इसका असर रुपये के मूल्य पर पड़ा है।
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जिओजीत बीएनपी परिबा फाइनेंसियल सर्विसेज लिमिटेड के रिसर्च हेड एलएक्स मैथ्यू के मुताबिक रुपये में आई गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार में बिकवाली करके मुनाफा बुक करना है। विदेशी निवेशक भारतीय कंपनी की अपनी हिस्सेदारी को बेच रहे हैं और ऐसा वे अमूमन हर साल दिसंबर में करते हैं। इसके अलावा रुपये में होने वाली कमजोरी के पीछे चालू खाते के घाटे में होने वाली बढ़ोतरी के साथ डॉलर में बास्केट करेंसी के मुकाबले आने वाली मजबूती भी है। उनका कहना है कि सोने के आयात में बढ़ोतरी इसलिए हो रही है क्योंकि कच्चा तेल अभी कमजोर है। वहीं यूरोप के बाजार में भी सुस्ती छाई है। ऐसे में निवेशक सोने के प्रति ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं।

जायफिन रिसर्च के मुख्य अर्थशास्त्री देबोपाम चौधरी के मुताबिक भारत के चालू खाता घाटे में रिकवरी के बावजूद वर्ष 2014 में डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में लगातार उतार-चढ़ाव रहा है। अमेरिका में ब्याज दरों बढ़ोतरी की उम्मीद से हाल-फिलहाल में विदेशी निवेशकों द्वारा रुपये की मांग में गिरावट आएगी।

इससे रुपया डॉलर के मुकाबले और कमजोर हो सकता है। जब तक भारत विदेशी निवेशकों की नजर में फायदे की जगह नहीं हो जाता है, रिजर्व बैंक की तरफ से ब्याज दरों में कटौती नहीं करने के फैसले से विनिमय दरों में होने वाले उतार-चढ़ाव पर रोक लग सकती है।
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