सब्जियों की आसमान छूती कीमतों के कारण उपभोक्ता और उत्पादक दोनों पर इसकी मार पड़ रही है। कट्स इंटरनेशनल द्वारा की गई स्टडी से पता चलता है कि मॉडल एक्ट लागू होने के एक दशक बाद भी कृषि बाजार की बाधाएं सुलझाई नहीं जा सकी हैं।
राज्य सरकारों ने मॉडल एक्ट की तर्ज पर अपने राज्यों में सुधार नहीं किया और निजी निवेश को प्रोत्साहन देने में असफल रहीं। कट्स की स्टडी में टमाटर को प्रतिनिधि कमोडिटी के तौर पर प्रयोग करते हुए दो राज्यों महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में कृषि विपणन पर फोकस करती है।
इस स्टडी से हाल में टमाटर की कीमतों में आई तेजी के बारे में अहम तथ्य पता चलते हैं। प्याज की कीमतें देश भर में बढ़ी हैं। जुलाई 2014 के आखिरी सप्ताह में जहां भोपाल में टमाटर की सबसे ज्यादा कीमत 85 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई वहीं दिल्ली में इसकी कीमत 70 रुपये प्रति किलोग्राम दर्ज की गई।
इसके अलावा बाजार के सूत्रों ने खुलासा किया हे कि टमाटर की कीमतें बढ़ कर 100 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंचने की उम्मीद है। टमाटर की कीमतों में आई अप्रत्याशित तेजी के लिए मानसून में देरी, टमाटर उत्पादक इलाकों में कम बारिश और आपूर्ति में कमी जैसे कारणों का हवाला दिया जा रहा है वहीं कृत्रिम महंगाई के लिए कृषि विपणन पर भारत के नियामकीय पहलू को जिम्मेदार माना जा रहा है।
कृषि राज्य का विषय है। ऐसे में केंद्र सरकार के कानून जैसे मॉडल एपीएमसी एक्ट तब तक अप्रभावी हैं, जब तक राज्य सरकारें इसे अपने राज्य में लागू न करें। कट्स स्टडी से पता चलता है कि महाराष्ट्र ने एपीएमसी एक्ट में संशोधन करते हुए डायरेक्ट मार्केटिंग, कांट्रैक्ट फार्मिंग और प्राइवेट मार्केट जैसी सुविधाओं के लिए रास्ता खोला है, लेकिन अब भी नियंत्रित बाजारों का एकाधिकार होने से कीमतों में कृत्रिम तेजी लाई जा रही है।
इसका असर पूरे देश पर पड़ता है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र और हिमाचल से ज्यादातर टमाटर की आपूर्ति पाने वाला राजस्थान इसका शिकार बना है जहां जून में टमाटर की थोक कीमत 4-6 रुपये प्रति किलोग्राम थी जो जुलाई में बढ़ कर 60 रुपये प्रति किलोग्राम हो गईं हैं।