भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की शक्तियां घटाए जाने की आशंका जताते हुए आरबीआई के अधिकारियों के एक समूह ने सांसदों और राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक पत्र लिखा है। अधिकारियों ने यह पत्र वित्त विधेयक में बजट प्रस्तावों को लेकर लिखा है।
पत्र अधिकारियों के एक फोरम यूनाइटेड फोरम ऑफ रिजर्व बैंक ऑफिसर्स एंड इम्प्लॉइज की ओर से लिखा गया है। पत्र में कहा गया है कि वित्त विधेयक कई ऐसे प्रावधान हैं जिनके काफी दूरगामी परिणाम होंगे और अगर इन्हें लागू किया गया तो देश के केंद्रीय बैंक के रूप में आरबीआई के कामकाज और शक्तियों पर काफी बुरा असर पड़ेगा।
पत्र में कहा गया है कि विधेयक के प्रावधान आरबीआई के अधिकारों में भी कटौती करने वाले हैं।
यह प्रावधान मौद्रिक नीति के मामले में रिजर्व बैंक के दायित्वों और अधिकारों को निरर्थक करने वाले हैं। इसके अलावा वित्तीय स्थिरता और महंगाई को नियंत्रित करने के मामले में भी इन प्रावधानों के चलते रिजर्व बैंक का काम प्रभावित होगा। बिल के कुछ प्रस्तावों में जहां 1934 के आरबीआई एक्ट में बदलाव की बात है, वहीं इससे 2006 का सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 1956 का सिक्यूरिटीज कांट्रेक्ट (रेग्यूलेशन) एक्ट और फेमा एक्ट भी भंग होता है।
पत्र में फोरम ने सांसदों से इस मामले को सरकार के सामने उठाने की अपील की है। अधिकारियों ने राष्ट्रहित में ऐसा करने की गुहार लगाई है। पत्र में कहा गया है कि सरकारी ऋणों के प्रबंधन का काम रिजर्व बैंक से छीना जाना जहां राज्यों के हितों के खिलाफ होगा, वहीं यह देश के संघीय ढांचे को भी प्रभावित करेगा। राज्यों के मुख्य मंत्रियों को लिखे गए पत्र में फोरम ने उन्हें इसके प्रति आगाह किया है।