विदेशों में तेल व गैस क्षेत्र से जुडे़ अधिग्रहण व अन्य मामलों को लेकर पेश आ रही दिक्कतों को हल करने में मदद के लिए पेट्रोलियम व गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का दरवाजा खटखटाया है। पेट्रोलियम मंत्रालय चाहता है कि विदेशों में अटक रहे मामलों को सुलझाने में उसे विदेश मंत्रालय का भरपूर सहयोग मिले, जिस तरह से चीन का विदेश मंत्रालय अपने देश की तेल व गैस कंपनियों के लिए करता है।
भारत की सरकारी पेट्रोलियम व गैस कंपनियों को पिछले दिनों में ईरान, ईराक, रूस, वेनेजुएला और मोजांबिक जैसे देशों में झेलनी पड़ रही परेशानियों और उन्हें हल कर पाने में मिली नाकामयाबी को देखते हुए अब पेट्रोलियम एवं गैस मंत्रालय ऐसे मामलों को विदेश मंत्रालय की मदद से पटरी पर लाने के बारे में सोच रहा है। इस संबंध में पेट्रोलियम मंत्रालय ने ऐसे मामलों की एक सूची तैयार की है, जिनको हल करने में उसे विदेश मंत्रालय के दखल की जरूरत पड़ सकती है। पेट्रोलियम मंत्रालय को उम्मीद है कि इन मसलों को सुलझाने में विदेश मंत्रालय सक्रिय भूमिका निभाते हुए उसकी मदद करेगा।
पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा चिह्नित किए गए ऐसे मामलों में ईरान के फरजाद बी गैस क्षेत्र को लेकर फायदेमंद करार, सूडान में बकाया भुगतान हासिल करने का मामला, वेनेजुएला में वहां की सरकार की ओर से ओवीएल को लाभांश के भुगतान का मामला, मोजांबिक के गैस क्षेत्र में काम शुरू करने के लिए सरकार की ओर से कजल्द आदेश हासिल करना, ओएनजीसी का नाम ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में कार्यरत कंपनियों की अमेरिका सरकार की सूची से बाहर करवाना और मध्य-पूर्व के देशों के हाइड्रोकार्बन क्षेत्र से जुड़े वेल्थ फंड में निवेश आदि शामिल हैं।
अमेरिका की ओर से लगाए गए प्रतिबंध के तहत कोई कंपनी ईरान परियोजनाओं में सालाना 2 करोड़ डॉलर तक का ही निवेश कर सकती है। इस सीमा के बावजूद ईरान में कोई भी निवेश करने वाली अमेरिका में प्रतिबंध का शिकार हो सकती है। ओएनजीसी पर अमेरिका ने अपने यहां के तेल व गैस क्षेत्र में काम करने पर इसी को लेकर रोक लगा रखी है।
इसी तरह ईरान में फरजाद बी गैस क्षेत्र का मामला भी ओएनजीसी के लिए काफी टेढ़ा होता जा रहा है। हाल ही में ईरान की सरकार ने फरजाद गैस क्षेत्र का नाम उन गैस क्षेत्रों की सूची में डाल दिया है, जिनका आवंटन नीलामी के जरिए किया जाएगा। ओएनजीसी चाहती है कि इसे नीलामी की प्रक्रिया से अलग रखा जाए, क्योंकि फरजाद गैस क्षेत्र में अपने गैस रिजर्व बनाने में वह काफी समय और पैसा खर्च कर चुकी है। ऐसे में पेट्रोलियम मंत्रालय चाहता है कि इस पेचीदा मामले को सुलझाने में विदेश मंत्रालय सक्रिय भूमिका निभाकर उसकी मदद करे।
हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के साथ हुई बैठक में पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने रूस में तेल क्षेत्र से जुड़े मामले में ज्यादा टैक्स छूट हासिल करने को लेकर उनके मंत्रालय से मदद का आग्रह किया है। रूस में मुश्किल संचालन वाले गैस क्षेत्रों को लेकर ओवीएल को कुछ टैक्स रियायतें तो मिली हुई हैं, पर पेट्रोलियम मंत्रालय चाहता है कि विदेश मंत्रालय की मदद से कुछ और वित्तीय सहूलियतें हासिल कर इन गैस क्षेत्रों के संचालन को कुछ और लाभप्रद बनाया जा सके।
ओवीएल का कहना है कि रूस के गैस क्षेत्र में कुछ और वित्तीय रियायतें हासिल करके ही इन परियोजनाओं को लाभदायक बनाया जा सकता है, क्योंकि यहां गैस निकालने के लिए उसे पश्चिमी देशों की पेट्रोलियम कंपनियों के जैसी उन्नत और महंगी तकनीक का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। इसके चलते उसकी लागत ज्यादा बैठ रही है, जिसकी भरपाई कुछ अतिरिक्त वित्तीय रियायतों को हासिल की जा सकती है।