पिछले दस सालों में जिस हिसाब से देश की जनसंख्या बढ़ी उसके मुकाबले प्याज की पैदावार में कई गुना ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। फिर भी प्याज लोगों के आंसू निकालने पर आमादा है।
पैदावार में 300 प्रतिशत की हुई है बढ़ोत्तरी
पिछले 10 सालों में प्याज की पैदावार में 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। भारत में 2002-2003 में 42 लाख मीट्रिक टन प्याज की पैदावार हुई थी जो 10 साल बाद 2012-2013 में 163 लाख मीट्रिक टन तक जा पहुंचा है। इन्हीं 10 सालों में भारत की जनसंख्या महज 1.7 प्रतिशत बढ़ी है।
ऐसा भी नहीं है कि प्याज की पैदावार में इस साल अचानक कोई कमी आ गई है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अनुसंधान और विकास फाउंडेशन, नासिक के उप-निदेशक एच आर शर्मा के अनुसार 2013-2014 में प्याज की पैदावार 10-15 फीसदी बढ़ने वाली है।
प्याज की कमी के पीछे निर्यात या प्रोसेसिंग उद्योग की भारी खपत भी कारण नहीं हैं। एक और कृषि मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाला प्याज और लहसुन अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर जयगोपाल का कहना है कि समूची पैदावार का 10 प्रतिशत ही निर्यात होता है और इतना ही प्रोसेसिंग उद्योग को दिया जाता है।
कमीशन एजेंज और सप्लाई सिस्टम का गोरखधंधा
तो फिर आपकी रसोई में उपयोग होने वाला प्याज कहां जा रहा है? सितंबर में हुई बारिश के कारण ट्रांसपोर्ट में जो दिक्कत आई है वही एक कारण है जिसके कारण प्याज की सप्लाई मंडियों तक नहीं पहुंच पाई है। प्याज की कमी के पीछे यहां की सप्लाई सिस्टम का काम करना प्रमुख कारण है।
इस साल के शुरुआत में भारतीय प्रतियोगिता आयोग (सीसीआई)ने भारत के प्याज बाजार पर एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें कहा गया था कि बाजार के हर स्तर में 'कमीशन एजेंट' अपना हिस्सा लेने के लिए बैठे हैं और इस 'दलाली' के कारण एक ओर किसान तो दूसरी ओर ग्राहक परेशान है।
यह रिपोर्ट प्याज क्षेत्र में आने वाली 11 मंडियों के किसानों, होलसेल व्यापारियों, कमीशन एजेंट्स, खुदरा दुकानदारों और ग्राहकों से मिलकर इंस्टीट्यूट फॉर सोशल एंड इकोनोमिक चेंज ने तैयार की है।
सीसीआई की सदस्य गीता गौरी बताती हैं कि हमने पाया है कि बड़े व्यापारी एक जटिल तंत्र को बनाए हुए हैं, जिनसे वह प्राथमिक मंडी से लेकर कीमतों तक को प्रभावित करते हैं। व्यापारी मंडियों में नीलामी तक नहीं होने देते।
प्याज से किसान परेशान, ग्राहक त्रस्त
जब यह सर्वे सीसीआई ने कराया था तब अपनी रिपोर्ट में पाया कि किसानों से प्याज महज 5 रुपये किलो के भाव से लिया जाता है। लेकिन जब यह प्याज पुणे और बैंगलोर में पहुंचता है तो इसकी कीमत 20 रुपये या इससे अधिक हो जाती है।
गीता गौरी का कहना है कि चूंकि कृषि राज्य सूची का विषय है हम अपनी रिपोर्ट राज्य सरकारों को भेज सकते हैं, कुछ कर नहीं सकते। हम कोशिश कर रहे हैं कि सरकारें इस रिपोर्ट को अपने राज्य में लागू करें।