सरकारी तेल व गैस कंपनियों की खरीद और निविदा प्रक्रिया में ज्यादा पारदर्शिता लाकर इसे सुधारने की कवायद केंद्र सरकार ने शुरू कर दी है। इसके तहत पेट्रोलियम मंत्रालय ने इन कंपनियों के लिए इस संबंध में नए दिशा-निर्देश जारी कर दिए हैं। नए दिशा-निर्देशों (गाइडलाइन) के अनुरूप सभी सरकारी तेल व गैस कंपनियों को 1 अप्रैल 2015 से 5 लाख रुपये से अधिक की किसी भी खरीद के लिए ई-टेंडर जारी कर ऑनलाइन निविदाएं आमंत्रित करनी होंगी।
सरकारी क्षेत्र की तेल और गैस कंपनियों की निविदा और खरीद नीति को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। खासतौर पर ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) पर खरीद में गैर पारदर्शी प्रक्रिया अपनाने को लेकर कानूनी विवाद भी उठते रहे हैं। इस सब पर लगाम लगाने के लिए ही पेट्रोलियम मंत्रालय ने नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
मंत्रालय की ओर से जारी यह नए नियम ओएनजीसी, गेल, आईओसी, एचपीसीएल और बीपीसीएल सहित इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (ईआईएल) पर भी लागू होंगे। इनमें कंपनियों को वस्तुओं और सेवाओं की खरीद की अपनी प्रक्रिया में और पारदर्शिता लाने को कहा गया है। इसके तहत तेल कंपनियों को 1 अप्रैल से 2015 से पांच लाख रुपये की किसी भी खरीद के लिए ई-टेंडर जारी करना होगा। हालांकि मालिकाने वाली चीजों (प्रोप्रेटेरी आइटम), प्रोसेस लाइसेंस, तात्कालिक जरूरत वाले छोटे-मोटे कंस्ट्रक्शन और खरीद के काम को इसके दायरे से बाहर रखा गया है। इसके अलावा एकल निविदा के आधार पर खरीद के टेंडरों को भी ई-टेंडर की बाध्यता से बाहर रखा गया है।
नई गाइडलाइन के तहत सभी सरकारी तेल कंपनियों को अपनी निविदा में तय की गई कीमतों की जानकारी नियमित रूप से एक-दूसरे को प्रदान करनी होगी। इसके अलावा कंपनियों को खरीद प्रक्रिया के तहत अपनाए जाने वाले अपने बेहतर तरीकों की जानकारी भी दूसरी सरकारी तेल कंपनियों को देनी होगी, ताकि पूरे सेक्टर के लिए व्यापक स्तर पर एक बेहतर खरीद प्रक्रिया का खाका तैयार किया जा सके।
कंपनियों सूचनाओं के आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया का पालन इस बारे में एक औपचारिक बैठक बुलाकर वित्त वर्ष 2015-16 से ही शुरू कर देना होगा। गाइडलाइन में सरकारी तेल कंपनियों से अपनी जरूरतों और आपूर्ति का आकलन तैयार करके उसके लिए निविदा जारी करने का समयबद्ध कार्यक्रम तैयार करने को कहा गया है।
नए नियमों के तहत किसी वेंडर को निविदा वाले कामों से अलग करने (बिजनेस हॉलीडे) हर तेल विपणन कंपनी को अपने प्रबंधन से अलग से मंजूरी लेनी होगी। साथ ही उन्हें वेंडर को काली सूची (ब्लैक लिस्ट) में डालने की सूचना केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीओ) को भी देनी होगी।