पेट्रोलियम ईंधन के सिमटते भंडारों के बीच एक अच्छी खबर है।
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे तरीके की खोज की है, जिसमें बैक्टीरिया की मदद से जब चाहे तब डीजल बनाया जा सकता है।
ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटेर ने शेल के साथ मिलकर यह तकनीक विकसित की है। हालांकि अभी इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर अमल में लाने में काफी चुनौतियां पार करनी होंगी।
लेकिन वैज्ञानिकों का दावा है कि खास किस्म के ई. कोलाई बैक्टीरिया की मदद से तैयार डीजल लगभग आम डीजल की तरह ही है।
इसमें पेट्रोलियम उत्पाद मिलाने की जरूरत भी नहीं पड़ती, जबकि वनस्पति से प्राप्त तेल से तैयार बायो डीजल में पेट्रोलियम उत्पाद बनाने की जरूरत होती है।
खास बात यह है कि बैक्टीरिया की मदद से तैयार डीजल के लिए इंजनों, पाइपलाइनों या टैंकरों में कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं होगी।
यूनिवर्सिटी ऑफ एक्सेटेर के प्रोफेसर जॉन लव ने कहा कि हमारा मकसद ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को भी 2050 तक 80 फीसदी तक घटाना है।
इसके लिए बिना कार्बन वाले डीजल को तैयार करना होगा। दुनियाभर में ऊर्जा की मांग बढ़ रही है और हमें ऐसे ईंधन की जरूरत है, जिस पर तेल के दामों में उतार चढ़ाव और राजनीतिक अस्थिरता का कोई असर नहीं पड़े।
ई. कोलाई बैक्टीरिया प्राकृतिक तौर पर शुगर को फैट में बदलता है। इस प्रक्रिया की मदद से ही डीजल के सिंथेटिक अणु बनाए जा सकते हैं।
ई.कोलाई का एक कैटालिस्ट के तौर पर पहले ही फार्मा कंपनियों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है। कम मात्रा में डीजल बनाने में इसका इस्तेमाल लैब में हो रहा है।
लेकिन इसकी मदद से व्यावसायिक तौर पर डीजल बनाना संभव होगा या नहीं, इसकी संभावना देखी जा रही है।