गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां आगामी बजट में सरकार से बैंकों के समान कर ढांचा चाहती है। साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादातर कारोबार करने वाली एसेट फाइनेंस कंपनियों को भी, वित्तीय समावेशन में अहम भूमिका निभाने का हक मिलने की मांग कर रही है। गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के संगठन फाइनेंस इंडस्ट्री डेवलपमेंट काउंसिल के डायरेक्टर रमन अग्रवाल ने अमर उजाला को बताया कि आरबीआई की पूर्व डिप्टी गवर्नर उषा थोराट की अध्यक्षता में गठित समिति के सिफारिशों के आधार पर आरबीआई ने ड्रॉफ्ट रिपोर्ट जारी की है। इसके तहत यह सिफारिश की गई है कि बैंकों पर लागू होने वाले कर ढांचे को ही एनबीएफसी पर लागू किया जाए।
अग्रवाल के अनुसार, रिपोर्ट में एनबीएफसी के कारोबारी तरीकों को भी बैंकों के समान करने की बात कही गई है। ऐसे में जब कारोबार के तरीके बैंकों के समान हो रहे हैं, तो कर ढांचा उन्हीं की तरह होना चाहिए। मसलन एनबीएफसी द्वारा दिए कर्ज पर मिलने वाली ईएमआई में कंपनी को ब्याज पर 10 फीसदी टीडीएस देना पड़ता है। जबकि बैंकों पर यह लागू नहीं होता है। ऐसे में इसे बैंकों के समान करना चाहिए।
इसी तरह, अभी बैंकों को अपनी गैर निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) के बदले में प्रोविजनिंग करने पर आयकर में 7.5 फीसदी से लेकर 10 फीसदी तक की छूट मिलती है। जबकि आरबीआई के नियमों के मुताबिक एनबीएफसी भी प्रोविजनिंग करती है, पर उन्हें इस पर किसी तरह की आयकर में कोई राहत नहीं मिलती है।
उन्होंने बताया कि बहुत सी एनबीएफसी कंस्ट्रक्शन उपकरण के फाइनेंस का कारोबार करती हैं। जो इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र के विकास में अहम भूमिका निभाती है। इसके बावजूद आयकर अधिनियम में उन्हें कई सारी छूट का फायदा नहीं मिलता है, जिसे दिए जाने की जरूरत है। साथ ही ज्यादातर एसेट फाइनेंस कंपनियां ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले और बैंकिंग सेवाओं से दूर लोगों को वित्तीय सेवाएं दे रही हैं। ऐसे में इनकी भूमिका वित्तीय समावेशन में काफी अहम है। इसे देखते हुए एनबीएफसी को इसके जरिए मिलने वाली कर छूट का लाभ मिलना चाहिए।