मोदी सरकार सरकारी और निजी क्षेत्र की कंपनियों के लिए गैस उत्खनन के नए अवसर बनाने के मद्देनजर एक नई पहल करने जा रही है।
निजी और सरकारी कंपनियों को देशभर में आवंटित कोल ब्लॉकों से कोयला निकासी के साथ कोल बेड मीथेन (सीबीएम) गैस की ऑटोमेटिक खोज और उत्खनन के लिए कैबिनेट मंजूरी देने की तैयारी है। यह मामला यूपीए-2 के कार्यकाल से अटका पड़ा है और केवल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) को कोल निकासी के साथ कोल गैस की खोज व उत्खनन की अनुमति है, जो कि इसमें बमुश्किल सक्षम है।
हालांकि, मोदी सरकार इस पुरानी प्रणाली को हटाने को इच्छुक है और अब वह इस प्रावधान को सरकारी और निजी क्षेत्र के सभी कोल ब्लॉकों को उपलब्ध कराना चाहती है। इसके लिए पॉलिसी में पूरी तरह बदलाव करने की जरूरत होगी और सरकार इस प्रस्ताव को विधिवत मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष लाएगी।
इसके अंतर्गत, कोल एवं कोल गैस का उत्खनन साथ-साथ करने के मामले में कंपनियों को ऐसे उत्पादन के लिए कोयले की वास्तविक उत्पादन योजना और टाइमिंग की शर्त पूरी करनी होगी। कोयला एवं पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा तैयार की गई नई पॉलिसी के अंतर्गत कोल गैस के साथ कोल खनन क्षेत्र के ओवरलैप होने की स्थिति में कोल माइनिंग लाइसेंस धारक को सीबीएम ऑपरेटर की तुलना में तरजीह मिलती है।
जिन जगहों पर सीबीएम ब्लॉक आवंटित किए जा चुके हैं, वहां कोयला मंत्रालय को जहां तक संभव हो ओवरलैप करने वाले कोल ब्लॉकों के आवंटन से बचना चाहिए। आंशिक ओवरलैप की स्थिति में कोल मंत्रालय और पेट्रोलियम को बैठक कर इस समस्या के समाधान का प्रयास करना होगा।
सुरक्षा कारणों के चलते जिन जगहों पर साथ-साथ उत्खनन करना संभव नहीं है और सीबीएम ऑपरेटर द्वारा बड़ी रकम पहले ही खर्च की जा चुकी है, तो इस स्थिति में सीबीएम लाइसेंस समाप्त कर दिया जाएगा। इस मामले में सीबीएम ऑपरेटर को मुआवजा दिया जाना चाहिए, जो स्वतंत्र रूप से किसी तीसरे पक्ष के आकलन द्वारा निर्धारित किया गया हो। इसके अलावा सीबीएम ऑपरेटर की संपत्ति का अधिकार कोल माइन लाइसेंस धारक के पास आ जाना चाहिए।
इसके साथ ही कोल माइन लाइसेंस धारक को तय नियम और शर्तों के आधार पर सीबीएम उत्पादन की अनुमति होगी। रॉयल्टी और प्रोडक्शन लेवल पेमेंट्स का भुगतान 10 फीसदी की दर से करना होगा। दोनों भुगतान मासिक आधार पर करने होंगे। सूत्रों के अनुसार सरकार सीबीएम यानी कोल गैस की खोज और उत्खनन को प्रोत्साहन देने के लिए अन्य दूसरे बड़े कदम उठाने की भी तैयारी कर रही है।
इसमें यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोल गैस की कीमत पर कोई अधिकतम सीमा नहीं होगी और खनन कंपनी को कोल गैस बाजार भाव पर बेचने की अनुमति होगी।
हालांकि, कोल गैस की न्यूनतम कीमत, जिस पर रॉयल्टी और प्रोडक्शन लेवल पेमेंट्स का भुगतान किया जाएगा, उस स्तर पर होगी, जिस पर पारंपरिक गैस की कीमत तय की गई है। अनुबंध संबंधी दिक्कतों और मौजूद सीबीएम ब्लॉकों को छूट देने के मुद्दे पर सरकार की योजना पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रियों के अंतर्गत एक अधिकार प्राप्त समिति बनाने की है, जो इसका समाधान करेगी।
वास्तव में देखा जाए तो सीबीएम ब्लॉक के साथ कोल ब्लॉकों की ओवरलैपिंग एक विकट समस्या बन गई है। यह समस्या अब और गहराती जा रही है जब कोयला मंत्रालय कोयले की भारी कमी को देखते हुए नए कोल ब्लॉकों की तलाश शुरू कर चुका है। कोल मंत्रालय ने जनवरी 2013 में 54 कैप्टिव ब्लॉकों का आवंटन किया था, जिसमें तेल एवं गैस या सीबीएम ब्लॉक के साथ ओवरलैपिंग की आशंका थी।
इसमें यह पाया गया कि 15 ब्लॉकों की ओवरलैपिंग सरकारी कंपनियों द्वारा संचालित सीबीएम ब्लॉकों के साथ हुई, जबकि निजी कंपनियों के साथ 4 ब्लॉक में यह मामले सामने आए। इन 15 ब्लॉकों में नौ सीबीएम ब्लॉक के फील्ड डेवलपमेंट एरिया में आते हैं।
इसके बाद सितंबर 2013 में फिर 37 कैप्टिव कोल ब्लॉक पेट्रोलियम मंत्रालय को जांच के लिए सौंपे गए। जांच में यह पाया गया कि 37 में से आठ ब्लॉक पूरी तरह या आंशिक रूप से सीबीएम ब्लॉक से ओवरलैप हो रहे थे, जबकि 15 ब्लॉक पूरी तरह नेल्प या प्री-नेल्प ब्लॉक के साथ पूरी तरह ओवरलैप थे।
इसके बार फिर 34 कोल ब्लॉक चिह्नित किए गए और इनमें से 22 पीईएल और पीएमएल क्षेत्रों के साथ औवरलैप थे। इसके बाद कोल मंत्रालय ने 203 कोल ब्लॉकों की नई सूची मान्यता के लिए हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) को सौंपी थी। डीजीएच ने इन ब्लॉकों के समन्वय की बात कही है और इस बात की काफी संभावना है कि इनमें से अधिकांश ब्लॉक मौजूदा तेल एवं गैस या सीबीएम ब्लॉक से ओवरलैप हैं।
कोयला मंत्रालय के अंतर्गत एक टेक्निकल कमेटी का गठन किया जा चुका है, जिसमें डीजीएच के प्रतिनिधि भी शामिल हैं। यह समिति ब्लॉकों के आवंटन से पहले उससे जुड़ी परेशानियों को दूरी करेगी, लेकिन अबतक इसमें कोई प्रगति देखने को नहीं मिली है।