देश में बिजली के उत्पादन में बढ़ोतरी के लिए सरकार गैस की कीमतों और पूलिंग का मसला सुलझा कर गैस आधारित बिजली संयंत्रों से उत्पादन बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत पेट्रोलियम व गैस मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय अब मिलकर इसपर काम कर रहे हैं। सरकार चाहती है कि इस मसले को सुलझा कर करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये की लागत से स्थापित गैस आधारित ऊर्जा संयंत्रों से 24,000 मेगावाट बिजली का उत्पादन किया जा सके।
उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक पेट्रोलियम व गैस मंत्रालय और ऊर्जा मंत्रालय मिलकर जल्द ही इस मसले को आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी (सीसीईए) की मंजूरी के लिए आगे बढ़ा सकते हैं। इसके तहत दोनों मंत्रालय सीसीईए के सामने गैस पूलिंग का नया प्रस्ताव पेश कर सकते हैं। ऐसे में दोनों मंत्रालय मिलकर गैस पूलिंग के एक ऐसे मॉडल का प्रस्ताव तैयार करने में जुटे हैं, जो मामले से जुड़े सभी पक्षों को स्वीकार्य हो।
माना जा रहा है कि दोनों मंत्रालय के बीज जिस प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है, उसमें घरेलू स्तर पर उत्पादित गैस और रिगैसीफाइड लिक्विफाइड नेचुरल गैस (आरएलएनजी) के परिवहन खर्च में 20 फीसदी की कटौती की जाएगी। पेट्रोलियम मंत्रालय इसपर राजी है और उसने गैस प्राइस पूलिंग का नया मॉडल तैयार होने के बाद संबंधित कंपनियों तक गैस पहुंचाने के लिए गेल इंडिया को गैस वितरण एजेंसी के रूप में चुना है।
कैबिनेट की मंजूरी के अलावा इस मसले पर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस विनियामक बोर्ड (पीएनआरजीबी) की भी मंजूरी लेनी होगी। साथ ही रिलायंस गैस ट्रांसपोर्टेशन इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड (आरजीटीआईएल) और गुजरात राज्य पेट्रोलियम निगम (जीएसपीसी) जैसे ऑपरेटरों की रजामंदी भी इसके लिए जरूरी होगी।
पाइप लाइन टैरिफ में कटौती के साथ ही गेल अपने मार्केटिंग मार्जिन को मौजूदा 0.18 डॉलर प्रति एमबीटीयू से घटाकर 0.1 डॉलर प्रति एमबीटीयू करने पर राजी हो गई है। इससे गैस आपूर्ति के खर्च में कमी आ सकेगी। ट्रांसपोर्टेशन टैरिफ और मार्जिन में इस कमी के चलते गेल को करीब 15,000 करोड़ रुपये के भार का वहन करना पड़ सकता है। इसके बावजूद अगले दो साल तक गैस की कमी बनी रह सकती है। इसके बाद गैस आपूर्ति तभी बढ़ सकती है, जब वर्ष 2015-16 तक के लिए लागू उर्वरक बनाने वाली कंपनियों को 31.5 एमएमएससीएमडी गैस की आपूर्ति की सीमा को आगे बढ़ाया जाए।
गैस पूलिंग के लिए पेट्रोलियम और ऊर्जा मंत्रालय ने दो विकल्प तैयार किए हैं। तैयार किए गए प्रस्तावों के अनुसार इन दोनों विकल्पों को स्वीकृति के लिए आगे बढ़ाया जाएगा। पहले विकल्प के तहत घरेलू गैस और आरएलएनजी की पूलिंग केवल 16,107 मेगावाट क्षमता वाले उन गैस आधारित संयंत्रों के लिए की जाएगी, जिनको गैस की आपूर्ति नहीं मिल पा रही है। उन संयंत्रों को इस विकल्प से बाहर रखा जाएगा, जिन्हें एपीएम गैस की सप्लाई हो रही है। दूसरे विकल्प में एपीएम क्षमता को भी शामिल करते हुए घरेलू गैस और आरएलएनजी की पूलिंग प्लांट की पूरी 24,149 मेगावाट की गैस आधारित उत्पादन क्षमता के लिए की जाएगी।
गौरतलब है कि मौजूदा समय में 8,042 मेगावाट के एपीएम आधारित पावर प्लांट 40.1 फीसदी क्षमता (पावर लोड फैक्टर) पर काम कर रहे हैं। ऐसे में उनमें बाकी की 16,107 मेगावाट की बिजली उत्पादन क्षमता का उपयोग नहीं हो पा रहा है। पूल की गई गैस से उत्पादित बिजली की कीमत 5.50 रुपये प्रति यूनिट के दायरे में रखी जाएगी। ऐसे में बिजली की उत्पादन लागत उसके विक्रय मूल्य से अधिक होने के चलते पावर प्लांटों की आय और लागत के बीच नकारात्मक अंतर आएगा।
हालांकि यह फार्मूले को लागू करने की राह में बाधक नहीं बनने पाएगा, क्योंकि इस अंतर को ऊर्जा और पेट्रोलियम मंत्रालय इस भार का मिलकर वहन करेंगे। बिजली उत्पादन के लिए आयातित एलएनजी को उत्पाद शुल्क से मुक्त रखने जैसे विकल्प भी इसके लिए अपनाए जा सकते हैं।