आम आदमी को महंगाई से राहत पहुंचाने के लिए सरकार भले ही तमाम वादे कर रही हो, लेकिन हकीकत यह है कि देश में लगभग 56 फीसदी ईपीएफ पेंशनरों को अब भी 1,000 रुपये से कम मासिक पेंशन मिल रही है।
सरकार ने खुद इस तथ्य को स्वीकार किया है। इसी के मद्देनजर श्रम मंत्रालय ने न्यूनतम मासिक पेंशन 1,000 रुपये निश्चित करने का एक प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजा है।
श्रम मंत्री मल्लिकार्जुन खडगे का कहना है कि अगर इस प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय की मंजूरी मिल जाती है, तो सभी कर्मचारियों को कम से कम एक हजार रुपये बतौर पेंशन प्राप्त हो सकेंगे। उन्होंने बताया कि मंत्रालय ने प्रस्ताव में न्यूनतम पेंशन के लिए सरकार के अंशदान को बढ़ाने की बात कही है।
हालांकि वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि ऐसा करने पर सरकार का वित्तीय बोझ बढ़ेगा। वित्त मंत्रालय फिलहाल राजकोषीय बोझ को बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। इसलिए न्यूनतम मजदूरी तय करने पर फिलहाल सहमति नहीं बन सकी है। सूत्रों की माने तो वित्त मंत्रालय ने न्यूनतम पेंशन तय करने के प्रस्ताव को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।
खडगे ने कहा कि लंबे समय से कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम के तहत पेंशनरों को निश्चित न्यूनतम पेंशन देने की मांग की जा रही थी। इसी के मद्देनजर श्रम मंत्रालय ने कर्मचारी भविष्य निधि योजना के तहत न्यूनतम मासिक पेंशन 1,000 रुपये करने का प्रस्ताव वित्त मंत्रालय को भेजा है।
श्रम मंत्री ने खुद यह स्वीकार किया कि देश में करीब 27 फीसदी पेंशनरों को वर्तमान में 500 रुपये मासिक से भी कम पेंशन मिल रही है, जबकि लगभग 56 फीसदी पेंशनरों को 500 रुपये से 1,000 रुपये मासिक के बीच पेंशन मिल रही है।
उन्होंने बताया कि हाल में ही न्यूनतम मजदूरी अधिनियम को कैबिनेट से मंजूरी मिल चुकी है। इसके मुताबिक केंद्र की ओर से तय मजदूरी प्रत्येक राज्य में रोजगार के लिए मान्य होगा, जबकि न्यूनतम मजदूरी की समीक्षा प्रत्येक पांच साल में नेशनल सैंपल सर्वे के उपभोक्ता व्यय सर्वे के आधार पर की जाएगी।