औद्योगिक विकास दर में आ रही कमी से अब वित्त मंत्रालय को नौकरियों में कटौती होने का अंदेशा सता रहा है। इसे देखते हुए मंत्रालय ने बैंकों को खास तौर से मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर के कर्ज में तेजी लाने और उसकी ब्याज दरों में कमी करने की बात कही है। सूत्रों के अनुसार वित्त मंत्रालय ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को प्रमुख रूप से कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन और छोटे और मझोले उपक्रमों को मिलने वाले लोन पर रियायत देने की बात कही है।
सूत्रों के अनुसार 15 नवंबर को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के प्रमुखों के साथ वित्त मंत्री पी चिदंबरम की बैठक में यह एक प्रमुख मुद्दा रहा है। वित्त मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार मौजूदा आर्थिक सुस्ती के दौर में मांग में कमी है। ऐसे में यदि मांग में तेजी नहीं आई तो इससे उद्योग जगत के तरफ से नौकरियों में कटौती की आशंका है।
इसे देखते हुए बैठक में वित्त मंत्री ने बैंक प्रमुखों से कहा है कि वह मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर को खासतौर से कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन और छोटे और मझोले उपक्रमों के लोन देने में विशेष प्रयास करें। अधिकारी के अनुसार इसके पहले होम लोन और ऑटो लोन में कमी करने का असर मांग के बढ़ोतरी रूप में दिखा है। ऐसे में इस माहौल में जरूरी है कि नई नौकरियों में भले ही उम्मीद के मुताबिक तेजी से न आएं, पर मौजूदा नौकरियां बने रहना बेहद जरूरी है।
इस उद्देश्य में बैंक खासतौर से भूमिका निभा सकते हैं। कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन जब फाइनेंस कंपनियों के जरिए जीरो फीसदी पर मिल रहा है। ऐसे में जरूरी है कि सार्वजनिक बैंक ब्याज दरें कम करें। इसके जरिए टीवी, फ्रिज, एसी जैसे कंज्यूमर ड्यूरेबल उत्पादों की मांग में तेजी आएगी। जिसका फायदा इंडस्ट्री को मिलेगा। अभी सार्वजनिक बैंक 13-15 फीसदी की दर पर कंज्यूमर ड्यूरेबल लोन दे रहे हैं।
मार्च 2012 तक के आंकड़ों के अनुसार भारतीय कंज्यूमर ड्यूरेबल इंडस्ट्री करीब 35,000 करोड़ रुपये की है। इसी तरह देश में कुल 2.61 करोड़ छोटे और मझोले उपक्रम हैं, जिनकी मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर में करीब 45 फीसदी हिस्सेदारी है। इसके तहत करीब छह करोड़ लोन रोजगार पा रहे हैं। वित्त मंत्री ने बैंक प्रमुखों से कहा है कि यह संभव है कि मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में छोटे कारोबारियों के तरफ से रीपेमेंट की समस्या आ रही हो, पर माहौल को देखते हुए बैंक उनके लिए लोन की रीस्ट्रक्चरिंग आदि जरूरी कदम उठाएं।