पिछले छह महीनों में भारत में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आई है, जिससे कि उपभोक्ता काफी खुश हैं। अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में जारी उथल-पुथल से भारत को फिलहाल तो फायदा हो रहा है, लेकिन ये खुशहाली कब तक बरकरार रहेगी? बीबीसी ने बात की तेल-गैस क्षेत्र के विशेषज्ञ नरेंद्र तनेजा से।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जून 2014 से अब तक 30 प्रतिशत की कमी आई है। इसके पीछे क्या वजह है? पहली वजह ये है कि अमेरीका में जिस हिसाब से शेल तेल और गैस का उत्पादन बढ़ा है, उससे उनकी मध्य-पूर्वी देशों पर जो निर्भरता थी, वो खत्म हो रही है।
आने वाले समय में अमेरीका इस क्षेत्र में आत्म-निर्भर भी हो सकता है। दुनिया के सबसे बड़े तेल उपभोग्ता वाले देश में ऐसा होने से उन देशों की चिंता बढ़ गई है, जो तेल का निर्यात करते हैं।
उधर सऊदी अरब की ये कोशिश है कि तेल की कीमत इस कद्र घटा दी जाए कि सीधा असर अमेरिकी शेल गैस और तेल की अर्थव्यवस्था पर असर पड़े।
राजनीति भी है एक वजह
घटते दामों की एक वजह राजनैतिक भी है, क्योंकि रूस अपनी 50% अर्थव्यवस्था के लिए तेल और गैस पर निर्भर है, तो तेल की कीमत घटा कर अमेरीका और पश्चिमी देशों की ये कोशिश है कि रूस की अर्थव्यवस्था चरमरा जाए। यूक्रेन को लेकर चूंकि तनाव बना हुआ है, तो पश्चिमी देश तेल कीमतों के जरिए रूस को घुटनों पर लाने की कोशिश में हैं।
इसके अलावा ईरान की अर्थव्यवस्था और राजनैतिक स्थिरता को बिगाड़ने के लिए सऊदी अरब की कोशिश है कि तेल के दाम नीचे ही रहें। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की गिरती कीमतों का भारत पर क्या असर पड़ेगा? भारत में इस्तेमाल होने वाला 80 फीसदी तेल विदेश से आयात होता है। यानि तेल की कीमत कम होने से भारत को काफी फायदा मिल रहा है।
तेल बेचने की लगी है होड़
ऊपर से तेल बेचने वाले देशों के बीच भारत को सस्ते दाम में तेल बेचने की होड़ सी लगी हुई है। तो फिलहाल ये भारत के लिए अच्छी खबर है।
लेकिन व्यक्तिगत रूप से मेरा या मानना है कि अगर स्थिति यूं ही चलती रही तो वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी आ जाएगी, जो भारत के लिए अच्छा नहीं होगा। और फिर भारतीय तेल कंपनियों ने अब तेल के नए भंडार खोजने में निवेश थाम लिया है।
तो इसका मतलब ये कि जब वैश्विक राजनीति बदलेगी, तो भारत शायद झटका झेलने के लिए तैयार न हो। तो तेल दामों को लेकर भारत में जो दीवाली मनाई जा रही है, वो ज़्यादा लंबी नहीं टिकने वाली।
भारत को दीवाली मनाने की बजाय दीर्घकालिक रणनीति बनानी चाहिए। तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ये स्थिति कब तक बनी रहेगी? तेल की दुनिया में ये कहा जाता है कि इसमें कल क्या होगा ये सिर्फ भगवान जानता है।
मुझे ऐसा लगता है कि जिस हिसाब से स्थिति चल रही है, तो तेल कम से कम एक साल तक सस्ता रहेगा। अगले एक साल तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल के एक बैरल की औसतन कीमत 70 डॉलर रहने की संभावना है।
डेढ़ साल तक तेल की कीमतों पर दबाव बना रहेगा, यानि कुल मिलाकर वो ऊपर जा कर फिर नीचे आएंगी। भारत को उस स्थिति के लिए तैयार रहना चाहिए।
(बीबीसी संवाददाता शालू यादव से बातचीत पर आधारित)