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सबको खुश करना, मोदी के लिए कठिन!

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डॉलर के मुकाबले रुपया 11 माह के सबसे ऊंचे स्तर पर होने और शेयर बाजार में तेजी के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार की राह में आर्थिक चुनौतियों की भरमार है।
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नई सरकार को न सिर्फ घरेलू और विदेशी निवेशकों का विश्वास बहाल करना होगा, बल्कि अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए तेजी से कदम भी उठाने होंगे।

फिलहाल यह महंगाई, ऊंची ब्याज दरें, बढ़ते राजकोषीय घाटे, चालू खाते के घाटे (सीएडी), कृषि उत्पादन पर अल-नीनो के संभावित खतरे और रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति से जुड़ी चुनौतियों से जूझ रही है।

देश का घाटा करना होगा कम

मोदी सरकार को उन बड़ी बाधाओं को भी दूर करना होगा, जिन्होंने आर्थिक विकास दर को कम करने के साथ नीतिगत निष्क्रियता और निराशा का वातावरण तैयार किया है।

सरकार की पहली परीक्षा बजट पेश करने के समय होगी। इसमें उनको उद्योग जगत, कंपनियों, मध्य वर्ग और विदेशी निवेशकों की अपेक्षाओं को पूरा करना होगा। इसके अलावा राजकोषीय घाटे को भी संतुलित करना होगा।

तेल और गैस की सब्सिडी एक चुनौती

यूपीए 2 सरकार ने राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.6 फीसदी के स्तर पर रखने के लिए खर्चो में 13 अरब डॉलर तक कटौती की।

यूपीए सरकार ने सब्सिडी के मद में 16 अरब डॉलर का बोझ नई सरकार के सिर पर डाल दिया है। नई सरकार के लिए यह लंबित सब्सिडी एक बड़ी चुनौती होगी। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकारी खर्चों में कटौती ही सही रास्ता होगा।

सरकार के ऊपर सरकारी तेल और गैस कंपनियों, उर्वरक सेक्टर और खाद्य सुरक्षा कानून के मद में बढ़ते सब्सिडी बिल से निपटना भी एक बड़ी चुनौती होगी। सब्सिडी का आम लोगों के जीवन पर बड़ा प्रभाव रहा है।

मध्य वर्ग को हैं जोरदार अपेक्षाएं

इसी तरह से सरकार का कर-जीडीपी अनुपात गिर कर 10.2 फीसदी पर आ गया है। 2007-2008 में यह अपने उच्चतम स्तर 12.5 फीसदी तक पहुंचा था। सरकार के लिए कर संग्रह बढ़ाना भी अहम चुनौती होगी।

पिछली सरकार ने अंतरिम बजट में राजकोषीय घाटे को 2014-15 में जीडीपी के 4.1 फीसदी पर लाने की बात कही थी। इसके लिए खर्च में औसत वृद्धि 10.9 फीसदी का अनुमान लगाया गया है, जबकि हाल के वर्षों में औसत खर्च वृद्धि लगभग 15 फीसदी रही है।

वहीं भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली सरकार मध्य वर्ग की जोरदार अपेक्षाओं के साथ सत्ता में आई है और उसका समर्थक वर्ग अगले बजट में कर छूट और कई तरह की राहत की उम्मीद कर रहा होगा।
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सोने के आयात पर अंकुश

यूपीए 2 सरकार 2013-14 में सोने के आयात पर अंकुश लगाकर सीएडी को रिकॉर्ड 4.98 फीसदी से घटा कर 2 फीसदी से भी कम पर लाने में सफल रही थी।

आयात शुल्क, ऊंची दरें और अन्य उपायों से सोना आयात में कमी आई लेकिन सोने की तस्करी में इजाफा हुआ है। भाजपा ने सत्ता में आने के तीन माह के अंदर सोने के आयात शुल्क की समीक्षा की बात कही है।

ऐसा करते समय इस बात ध्यान रखना होगा कि इस कदम से रुपये की मजबूती पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
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