राजनीतिक दलों को दिए गए फंड की जानकारी अब कंपनियों के लिए छुपाना आसान नहीं होगा। नए कंपनी कानून के तहत अगर कोई कंपनी किसी पार्टी को बिना किसी इलेक्टोरल ट्रस्ट के फंडिंग करती है, तो उसका ब्योरा कंपनी को अपने बुक में देना अनिवार्य होगा।
कंपनी कानून के इस प्रावधान से राजनीतिक पार्टियों को कॉरपोरेट जगत से मिलने वाली फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी।
कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय द्वारा जारी नए कंपनी कानून के नियम के मुताबिक कंपनियां राजनीतिक पार्टियों को फंडिंग इलेक्टोरल ट्रस्ट के साथ-साथ सीधे तौर पर भी कर सकेंगी। इसके तहत इलेक्टोरल ट्रस्ट को दिए गए फंड की जानकारी कंपनियों को राजनीतिक दल के हिसाब से नहीं देनी होगी। लेकिन जो कंपनियां सीधे तौर पर राजनीतिक दल को फंड देंगी, उन्हें उसका ब्योरा अपने बुक में देना होगा।
टाटा-रिलायंस जैसी कंपनियों ने बनाए ट्रस्ट
कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार नया कंपनी कानून जो कि एक अप्रैल से लागू हो गया, उसके सेक्शन 192 (3) के तहत सीधे तौर पर फंड करने वाली कंपनियों को ब्योरा देने का प्रावधान किया गया है। इसी तरह 182 (3) के तहत इलेक्टोरल ट्रस्ट में पूंजी देने वाली ऐसी कंपनियों को भी ब्योरा देना होगा, जिनका अपना इलेक्टोरल ट्रस्ट नहीं है। अधिकारी के अनुसार इन दो सेक्शन से कॉरपोरेट फंडिंग में काफी हद तक पारदर्शिता आने की उम्मीद है।
अधिकारी के अनुसार इसके लिए अलावा इलेक्टोरल ट्रस्ट का भी प्रावधान है, जिसके जरिए कंपनियों को केवल अपने ट्रस्ट बनाने है, जिससे वह फंडिंग कर सकेगी। फंड को डिसक्लोज करने की जिम्मेदारी कंपनी की न होकर ट्रस्ट होगी। मार्च तक तक रिलायंस, महिंद्रा, टाटा, बिड़ला सहित 10 से ज्यादा कंपनियों ने ट्रस्ट बनाए हैं। ऐसे में जिन कंपनियों ने ट्रस्ट नहीं बनाया है, उनके लिए अपने बुक में ब्योरा देने का नियम पारदर्शिता बढ़ाने में कारगर होगा।