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कृषि उत्पादों की बर्बादी पर गुमराह कर रही है सरकार

Sat, 13 Oct 2012 12:22 AM IST
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
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फसलों के खेत से लेकर उपभोक्ता के घरों में पहुंचने तक होने वाली बर्बादी को सरकार बढ़ा चढ़ाकर बताकर न सिर्फ देश को गुमराह कर रही है। बल्कि गलत आंकड़ों के जरिए की जा रही झूठी बयानबाजी से स्थिति को भयावह बनाने की कोशिश भी की जा रही है।
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मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई पर अमर उजाला की ओर से आयोजित की गई परिचर्चा मंथन में भाग लेते हुए कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने बताया कि कृषि उत्पादों के खेत से उपभोक्ता के हाथों तक पहुंचने में होने वाली बर्बादी के आंकड़ों को सरकार बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है।

खासबात यह है कि उत्पादकों से लेकर उपभोक्ताओं तक में भ्रम फैलाने का काम प्रधानमंत्री से लेकर सभी आला मंत्री कर रहे हैं। जबकि हकीकत में ना ही इतनी बड़ी मात्रा में अनाज की बर्बादी हो रही है और ना ही फल-सब्जी सहित अन्य उत्पादों की । यही नहीं जिस सर्वे के आधार पर सरकार दो तिहाई फसलों की बर्बादी की बात कह रही है, उन आंकड़ों में कृषि उत्पादों के साथ बड़ी हिस्सेदारी पशु उत्पादों की भी है।
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उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री से लेकर कृषि राज्य मंत्री तक सभी फसल के बाद होने वाली बर्बादी 40 फीसदी बता रहे हैं, जो सरासर झूठ है। सरकार यह आंकड़ा सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पोस्ट हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सिपहेट) के ताजा सर्वे के आधार पर बता रही है। जबकि सिपहेट ने अपने सर्वे में सालाना 3 से 12 फीसदी तक सब्जी और 5 से 18 फीसदी तक फसल बर्बाद होने की बात कही है। मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई की वकालत में सरकार झूठ बोल कर स्थिति को भयावह बनाने की साजिश कर रही है।
 
दरअसल सिपहेट के 13 जुलाई 2010 के सर्वे में सालाना 44,000 करोड़ के कृषि व पशु उत्पादों के नष्ट होने की बात कही गई है। सर्वे के मुताबिक हर साल 12,593 करोड़ रुपये का अनाज, 1,735 करोड़ रुपये मूल्य की दालें, 5,107 करोड़ रुपये के तिलहन और 5,764 करोड़ रुपये मूल्य के मसाले एवं अन्य प्लांटेशन वाली फसलों की बर्बादी हो रही है।

यही नहीं, आधुनिक तकनीक जिसमें कटाई, छटाई और शीतगृहों का अभाव होने से 7,437 करोड़ रुपये के फसल और 5,872 करोड़ रुपये मूल्य की सब्जियां नष्ट हो रही हैं। इस बर्बादी से पशुधन अछूते रह गए हैं बल्कि उनकी बर्बादी भी दूसरों से कम नहीं है। हर साल लगभग 5,635 करोड़ रुपये मूल्य के पशुधन जिसमें दुग्ध उत्पादों के अलावा मांस, अंडा और मछली भी शामिल है।

कैट के महामंत्री नरेंद्र मदान के मुताबिक एफडीआई के समर्थन में सरकार यह भी ढोल पीट रही है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां 30 फीसदी उत्पाद देश के लघु और मध्यम उद्योग से खरीदेंगी। लेकिन मल्टी ब्रांड रिटेल में एफडीआई पर जो नोटिफिकेशन सरकार की ओर जारी किया गया है उसमें यह स्पष्ट नहीं है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां हर साल 30 फीसदी खरीद देश के लघु उद्योगो से करेंगी। इस परिचर्चा में व्यापारी नेता सतीश गर्ग, विजय बुद्धिराजा, विजय प्रकाश जैन और किशोर खारावाला सहित उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड से आए अनेक व्यापारियों ने हिस्सा लिया।
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